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ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु श्री बलदेवदास महाराज

श्री रामदेवपीर पीठ — पीपलीधाम

  1. प्रागट्य और दिव्य संकेत

    मातुश्री जीवुमा पिताश्री हरजीवनदास । बलदेव सद्गुरु सवारामना चरणकमलनो दास ॥

    चेतन ब्रह्म रणुजा के राय पीर रामदेवजी महाराजने श्री सवाराम साहब को बचन देते हुए ऐसे शब्द का उच्चार किया था कि, ‘‘आगे समय सानुकूल बनते ही अनायासे जिस पुरुष के हाथो जो बननेवाला है वो बनेगा ।’’

    ये शब्द यहाँ भावि में प्रगट होनेवाले महापुरुष का संकेत करते है । श्री सवाराम साहबने नागदेव की शान से खुदने व्यवसाय छोड दीया था मगर उनके सुपुत्र श्री हरजीवनदास और उनकी धर्मपत्नी श्री जीवतीबाई ( जीवुमा ) अपने व्यवसाय में मुसीबते झेलकर भी घर का गुजारा करने के अलावा यहाँ पधारते हुए साधु संत की सेवा भी करते थे और सदाव्रत की कार्यवाही को भी नीभाते थे ।

    ऐसे भक्त और भक्ति के घर प्रजापति कुल में ( ज्ञाति में ) श्री हरजीवनदास को निमित्त बनाकर उनके घर वि.सं. १९९० ( इसवीसन १९३४ ) ज्येष्ठ सुद १५ रविवार के दिन श्री बलदेवदास महाराज का प्रागट्य हुआ । अलौकिक शक्तिवाले निझारी पुरुष का प्रादुर्भाव हुआ । जिस तरह कीचड में कमल खीलता है उसी तरह पीपली जैसे गाँव में उनको धर्मभूमि बनाने और श्री रामदेव पीर का पावन धाम बनाने के लिए उनका आगमन हुआ । उनके बारे में संतपुरुषोने जो दिव्य शब्द का संकेत दिया है और श्री बलदेवदास महाराज की जो चेष्ठा, जो कार्य है उनसे ये सत्य की प्रतीति होती है ।

    उन्होंने प्रागट्य के समय पयपान शुरु नहीं किया था । सब चिंतीत हो गए । उसी समय श्री सवाराम साहबने उनके शीर पर अपना हाथ रखकर जो शब्द निकाले, जिस शब्द का प्रयोग किया वो बहोत गर्भित और शानयुक्त है । उन्होंने कहा कि, ‘‘भाई, ऐसा नहीं चल सकता । शरीर को धारण करके आप इस संसार में आये है तो आपको इस शरीर के अनुकूल होना ही चाहिए । आपको पसंद हो या न हो, आपकी ईच्छा हो या न हो फिर भी मानव सहज चेष्ठा को धारण करनी पडती है । उसको अपनानी पडती है ।’’

    इन शब्दो का मर्म अपनाते हुए उन्होंने मानव सहज चेष्ठा को धारण कर ली और पयपान शुरु कर दिया । श्रीराम, श्रीकृष्ण, श्री रामदेव पीर ये सब अवतारी पुरुषोने भी मानवसहज चेष्ठा और मर्यादा का स्वीकार करके अपना कार्य कीया है । श्री सवाराम साहब के ये शब्द यहाँ प्रगट हुए महापुरुष की झांकी कराता है ।

    इसके अलावा गिरनार के २५० साल की उम्र के सिध्धपुरुष श्री शांतिगीरी महाराजने भी बाल स्वरूपी श्री बलदेवदास महाराज के शीर पर श्री सवाराम साहब का हाथ रखवाया था और बाद में उन्होंने अपना हाथ रखा था । उस समय श्री शांतिगीरी महाराजने श्री सवाराम साहब को कहा कि, ‘‘आपने अब इस बालक के शीर पर अपना हाथ रखा है तो गुरु महाराज के प्रताप से ये महान पराक्रमी और सिध्धपुरुष होगा और सारी विश्व में उसका डंका बज जाएगा ।’’ उनके इन शब्दो का प्रभाव अब समय आने पर सच्चा साबित हो रहा है ।

    इसी तरह ध्रांगध्रा शहर के काशी विश्वनाथ मंदिर के महापुरुष श्री नारायण स्वामी के शब्द भी सूचक है । श्री बलदेवदास महाराज के प्रागट्य का संदेश देने के लिए उनके पिता श्री हरजीवनदास श्री नारायण स्वामी के पास गये थे । इस शुभ संदेश सुनकर श्री नारायण स्वामीने आगमवाणी जैसे शब्द का प्रयोग करते हुए कहा कि, ‘‘मैं वो बात जानता हूँ । तेरे घर जो लडका है वो राजतीलक है । ये बात याद रखना । मुझे वो पता है । उसने बहोत योग किया है और राज भुगत कर आया है । आगे देखना क्या होता है । वो सारी दुनिया में नाम कमायेगा । उनका नामप्रकाश चारों ओर फैल जाएगा । मगर ये बात अभी किसीको बताना मत । समय आने पर सबको मालूम हो जायेगा ।’’ इस तरह इनके ये शब्द भी अवतारी पुरुष का निर्देश करते है ।

    उनके अवतारी पुरुष होने का एक ओर प्रमाण मिलता है । उनकी जन्म कुंडली बनाते समय ध्रांगध्रा के विद्वान ज्योतिषी कालु महाराजने श्री हरजीवनदास को अचंबित होते हुए कहा कि, ‘‘ये बालक कोई अवतारी पुरुष हो ऐसा लगता है । ये महान बनेगा । समय आने पर इसकी महानता प्रगट होगी और धर्मक्षेत्र में जगत में उनकी नामना होगी । सारी दुनिया इसके चरणो में झूकेगी और शीर नमायेगी । विश्व में युगों तक उसका नाम अमर हो जाएगा ।’’

    उस समय के समय-संजोग को ध्यान में रखते हुए श्री सवाराम साहबने वो जन्म कुंडली रखी नहीं थी । अब वो समय दिखाई दे रहा है ।

  2. विविध व्यवसाय

    ऐसे दिव्य संकेतवाले श्री बलदेवदास महाराज को करीब छ सालकी आयु में पीपली में सरकारी प्रायमरी पाठशाला में शिक्षा के लिए दाखिल किये गये । यहाँ पर उनको पढाई के साथ कोई रीश्ता ही न हो ऐसा लगता था । पढाई में उनका ध्यान नहीं लगता था । अपने बाल साथीयों के साथ वे खेलकूद और धींगामस्ती में अपना समय बीताते थे । ऐसा लगता था कि बिना पाठशाला की शिक्षा वे ज्ञान के अखूट खजाना बननेवाले थे । उन्होंने पाठशाला के अपने कक्ष में लम्बे पाँव आराम करनेवाले अध्यापक को कुरशी हिलाकर जमीन पर पटक दिया था और बाद में वे भाग निकले । अपने विद्यागुरुको कक्ष में पटक कर जगाने की कोशिष की और बाद में पाठशाला को छोड दी । इसके बाद अपने घर पर ही उन्होंने कक्कावारी का अध्ययन किया ।

    बाद में करीब १४-१५ साल की छोटी उम्र में ही उन्होंने अपना व्यवसाय अपनाया और घर की आर्थिक स्थिति को देखकर अपने पिताजी को व्यवसाय में सहाय करने लगे । उस मिट्टी के व्यवसाय में उन्होंने काबेलियत हांसल कर ली थी ।

    उन्होंने अलग अलग प्रकार के कई व्यवसाय किये । घर की छत को छांवरने के देशी नलिया बनाते थे और उसी काम में उनकी आश्चर्यजनक झडप थी । वे मिट्टी के खिलौने बनाकर रंगरोगान करते थे । उन्होंने साझेदारी में मकान बनाने की इंटो का भी धंधा किया । पीपली में किराने की दुकान भी चलाई । बाद में सायकल को दुरस्त करने की, ट्युब पंक्चर दुरस्त करने की और सायकल को भठ्ठे का रंगकाम करने की दुकान भी लगाई । बाद में हलवाई की दुकान बनाई और हलवाई वे खुद बनाते थे ।

    कृषिक्षेत्र में भी उन्होंने बहुत काम किया है । खेत में खेडने का, फसल को काटने का, घास को काटने का, ये सब उन्होंने मेहनत करके किया है । अकाल के समय सरकार के राहतकार्य में जमीन खोदने का काम भी किया है । सदाव्रत को नीभाने के लिए ये सब मजदूरी की है ।

    उस समय किसको पता था कि मेहनत मजदूरी करनेवाला प्रजापति युवान जगत में सूर्य के समान तेजवाला और जगत को ज्ञानरूप प्रकाश देनेवाला ज्ञानीपुरुष के रुप में प्रकाशीत होगा ! उस समय किसको मालूम था कि ये साधारण दिखाई देता युवान भविष्य में हजारो जीवात्माओं का जीवन प्रकाशीत करनेवाला और अपने शरण में आये हुए त्रिविध ताप से पीडीत जीवात्माओं के ताप मिटानेवाला और शांति प्रदान करनेवाला महापुरुष के रुप में प्रगट होगा ! किसको जानकारी थी कि ये पुरुष विश्व में ‘‘श्री सवाराम साहब’’ का नाद हरेक के गगनमंडल में गूंजता हुआ करेगा । उस समय किसको पता था कि बचपन में ‘बचु’ नामवाला ये हर दिन दिखाई देनेवाला युवान जगत में सत्य सनातन धर्म का महान प्रवर्तक बनेगा और पीर हो के पूजनीय बनेगा ! किसको पता था कि ‘बचु’ नामक ये लडका ‘‘बलदेव पीर’’ या ‘‘ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु श्री बलदेवदास महाराज’’ के रुप में विश्व में कीर्तिमान होगा ! किसको पता था कि ये पुरुष जगत में ‘‘श्री बलदेवदास साहब’’ के रुप में जाना जाएगा और अमर हो जाएगा ।

  3. भजन प्रेम और सद्गुरु सेवा

    इस तरह आजीविका के लिए मेहनत करते करते उनको भजन के प्रति लगाव पैदा हुआ । भजन सत्संग में उनकी रुचि बढी । श्री सवाराम साहब अपने भक्त और सेवक के अति आग्रह से भजन सत्संग के लिए गुजरात के विविध इलाके में और गाँवो में घूमते रहते थे । कई बार वे अपने साथ बलदेवदास महाराज को भी ले जाते थे । समय बीतने पर श्री सवाराम साहब और उनके बीच गुरु-शिष्य का अतूट संबंध स्थापीत हुआ । इसी संबंध से उन्हें गुरु ज्ञानधारा का लाभ मिलने लगा ।

    विवाह की उम्र होते ही उनका ब्याह ( विवाह ) ध्रांगध्रा इलाके के भराडा गाँव में हुआ था । उनके धर्मपत्नी का नाम श्री गोदावरीबेन ( माताजी ) है । दांपत्यजीवन के फल स्वरूप उन्हे दो सुपुत्र और दो सुपुत्री हुए ।

    श्री बलदेवदास महाराज के दोनों छोटे भाई श्री महादेवभाई ( पूजारी ) और श्री शंकरभाई ( दादा ) भी अपनी योग्य उम्र होते ही उनको मिट्टीकाम में सहायक हुए ।

    श्री बलदेवदास महाराज को भजन के प्रति भाव और लगनी लगने से वे भी भजन गाने को सीखा । उन्होंने सबसे पहेले श्री सवाराम साहब का भजन ‘‘मैं नाम साहब का नूरी, नथी योग सिध्धिनी जरूरी’’ ये सीखा ।

    बाद में बहुत भजन गाने लगे । दूसरे गांवो से भी भजन में आने का वायक ( आमंत्रण ) मिलने लगे । वे दिनको काम करते थे और रात को भी भजन में से आने के बाद भी काम करते थे । काम के साथ साथ श्री सवाराम साहब की सेवा में भी तत्पर रहते थे । तन मन से प्रेमपूर्वक सेवा करते थे । श्री सवाराम साहब उग्र प्रकृति के थे फिर भी धीरज के साथ उनकी सेवा करते थे । सद्गुरु की कसोटी में से वे पार उतरे । इसलिए श्री सवाराम साहब की कृपादृष्टि उन पर टीकी ( ठहेराई ) ।

    इस तरह हरेक व्यवसाय करके, मेहनत करके, संकट सहते हुए सद्गुरु की सेवा करते करते वे अपने परिवार के खास आर्थिक सहयोगी बन गए । श्री सवाराम साहब की संत सेवा की परंपरा और प्रणालिका निभानेवाले विकास के मुख्य आधार बने रहे ।

  4. गुरु कृपा - गुरु भेद बक्षिस

    श्री बलदेवदास महाराज का जन्माक्षर का नाम मगन था । लेकिन प्यार में सब उन्हें ‘बचु’ कहकर बुलाते थे । बाद में नरसिंहपुरा गाँव के हीरा भगतने उनका चापल्य और चेतनता देखकर उनको ‘चेतनदास’ ऐसा नाम दिया । व्यवसाय की कुशलता, गुरुसेवा, संतसेवा और मंदिर की कार्यवाही इन सबमें उनकी चेतनता स्पष्ट रुप में दिखाई देती थी ।

    श्री बलदेवदास महाराज को ‘बलदेव’ ऐसा नाम श्री सवाराम साहबने दिया है । श्री बलदेवदास महाराज के पीछे कोई गेबी परिपूर्ण शक्ति काम कर रही है ऐसा श्री सवाराम साहबने महेसूस कीया । उस समय पर घर-मंदिर में उपस्थित होती हुई घटनाओं से ये बात उनके ध्यान पर आई । इन गेबी शक्ति की वजह से उनको ‘‘बलदेव’’ ऐसा नाम दिया । ऐसे नामाभिधान के वक्त पर श्री सवाराम साहबने श्री बलदेवदास महाराज के पोशाक में भी परिवर्तन करवाया । कमीज और पायजामा की जगह कुरता और धोती धारण करने को कहा । शीर के केश छोटे करवाये और सुवर्ण के गहने धारण करने से मना किया ।

    सद्गुरु की आज्ञा का संपूर्णतः पालन करनेवाले श्री बलदेवदास महाराज को गुरुकृपा से पहले ही चौथे मुकाम तक की स्थिति प्राप्त हो गई थी । इससे उनके भीतर से वाणी प्रगट होने लगी । उस समय उन्होंने बनाए हुए दो भजन के नामाचरण श्री सवाराम साहबने दिये थे और एक का उन्होंने दिया था ।

    बाद में वि.सं. २०१७ मार्गशीर्ष वद ६ बुधवार के दिन रात को श्री सवाराम साहबने उन पर पूर्ण कृपा करके अपनी सब अलौकिक संपत्ति सुपरत की । श्री सवाराम साहब की शब्दरस धारा उन ब्रह्मांड में मिल गई । अपनी जन्मगत दिव्य शक्ति में वो सामिल हो गई और भविष्य में वे सवाया साबित होनेवाले थे ।

    इसके बाद श्री सवाराम साहब का सतलोकवास होने के बाद उनके पीछे मंडप मेले के सुअवसर पर उनको गुरुगादी सुपरत होने से अब वे ‘ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु श्री बलदेवदास महाराज’ बन गए । वे अब जगत के जीवात्मा को मोहनींद से उगारनेवाले महापुरुष बन गए । अब वे मंदिर के साधारण गादीपति नहीं थे ।

  5. धर्म के लिए परिश्रम

    लेकिन लोगों को ये महापुरुष है ऐसा भरोसा नहीं आता था । लोगोने अपनी आँखो के सन्मुख उनकी युवानी, उनका जीवन, उनका पोशाक, मिट्टी का धंधा, गरीबी, प्रजापति कूल ये सब देखा था । तो इस प्रजापति युवान पर भरोसा कैसे जताए । कुछ लोग तो कटु वचन का प्रयोग भी करते थे । लोगोंने मंदिर आने का भी बंध किया था । जब जब महापुरुष या अवतारी पुरुष प्रगट रुप में सन्मुख होते है तब इनकी पहेचान ज्ञानी के अलावा ओर किसी को नहीं होती है । इसलिए आम लोगों को विश्वास आना कठिन बात है ।

    श्री बलदेवदास महाराज उपर के आदेश से या फरमान से कोई समय को ध्यान में रखते हुए, कारण-कार्य के विश्वकानून को निभाते हुए, इस अवनि पर पधारकर उन्होंने अपने कार्य की शुरुआत की । जगत के जीवों को उजागर करने के लिए और भरोसा दिलाने के लिए उन्होंने स्वयं जिज्ञासु और मुमुक्षु के घर पधारने का प्रारंभ कीया । धर्म और परमार्थ के लिए परिभ्रमण शुरु किया । उस समय पर प्रवास कठिन था । वाहन की सुविधा भी कम थी । कच्चे रास्ते, कभी पैदल प्रवास, ग्रीष्म की प्रखर गरमी, वर्षाऋतु में पानी में से चलकर गुजरना ये सब प्रतिकूल बाबत या संजोग का सामना करके उन्होंने विचरण करना शुरु किया । विचरण करते हुए उन्होंने धर्मप्रेमी आत्माओं का ज्ञानधारा, वार्तालाप और सवाल-जवाब, भजनभाव इन सभी माध्यम से सबको आनंद कराते हुए संतुष्ट करने लगे । हरेक को अपने भाग्य अनुसार ज्ञानधारा का लाभ देते हुए सद्गुरुपद के महिमा को बढावा देने लगे और अपनी सर्वलक्षीधारा का परिचय देते हुए सर्वलक्षी पुरुष के रुप में लोगो में उभरने लगे । इस समय दोरान उनके खाने पीने का सोने का या आराम करने का कोई समय निश्चित नहीं रहता था। ऐसे २५ साल तक जीवन बिताते हुए उन्होंने लोगो में विश्वास का माहोल पैदा किया ।

    इस समय में उन्हें विदेहदशा प्राप्त हुई । दैनिक दैहिक जरुरियात में विक्षेप हुआ । अपनी चित्तवृत्ति देह की भीतर केन्द्रित हो गई । ये अनुभव किसी को न होने की वजह से उनके ये परिवर्तन को कोई भी समज न पाया । बाद में जब विदेहदशा में से अपना चित्त बाहर आया तो उन्होंने अपने मन या चित्त को कभी भी निष्क्रीय नहीं रहने दिया। वे सतत कोई भी काम में जुटे रहे ।

    अब धीरे धीरे श्री रामदेवपीर पीठ उनकी आध्यात्मिक शक्ति, भक्ति और ज्ञानधारा का केन्द्र बनने लगा । सत्य सनातन धर्म के प्रमुख धाम में पीपली रुपांतरीत होने लगा । ये सब बाते ईर्षा द्वेष का निमित्त कारण भी होने लगी । लेकिन श्री बलदेवदास महाराज स्वयं गुण का धाम होने की वजह से ये सब धैर्य के साथ सहन किया। वे ये सब जानते थे । समय आने पर इन्साफ होनेवाला था । इसलिए उनके भीतर, प्रेम, समानता, आधिनता, उदारता, करुणा, दया ये सब गुण थे । उनके जीवन में वाणी और वर्तन का समन्वय और संवादिता दिखाई देते है ।

  6. अखूट आध्यात्मिक ज्ञानधारा

    उनके भीतर गुरुकृपा से जो अनुभव हुआ, जो प्रकाश हुआ उसके चलते, उस आधार से उनकी जिह्वा द्वारा वाणी प्रगट होने लगी । उनकी पढाई तो सिर्फ अक्षरज्ञान तक सीमीत ही थी फिर भी आज के बडे बडे कवि और लेखको को भी आश्चर्य में डाल दे इतनी हद तक उनकी आध्यात्मिक वाणी में वैविध्यता, विपुलता और नाविन्य है । ये सभी वाणी या भजन या काव्य उनके यहाँ के ग्रंथो में प्रकाशित हुए है । श्री सवाराम साहब की तरह उनकी वाणी में भी जो विविधता है उनको देखकर बडे बडे साहित्यकार भी अचंबित हो कर साहित्य की अपनी मर्यादा का भी एहसास करते है । उनकी वाणी या काव्य रचना में जो विविधता है वो इस प्रकार है ।

    १. स्तुति २. साखी ३. आरती ४. गुरुमहिमा ५. थाळ ६. भजन ७. सातवार ८. कक्को ९. आशावरी १०. धोल ११. प्रभाती १२. सवैया १३. आराधी १४. पंद्रह तिथि १५. काफी ६. कीर्तन १७. कुंडलीया १८. रेखता १९. धून २०. गझल २१. बारह मास २२. परज २३. गरबी २४. कान गोपी २५. छप्पा २६. छंद.

    सत्य सनातन धर्म की परंपरा को निभाते हुए उनकी जो ज्ञानधारा है वो अखूट है । ‘‘श्री सवाराम साहेबनी अमरधारा’’ नामक यहां के ग्रंथ में उनकी ज्ञानधारा के कुछ हिस्सो कों संमीलीत किया गया है जो इस प्रकार है ।

    (१) गुरुमहिमा (२) मानवमणि प्रकाश (३) सत्संगधारा (४) भ्रांति ही दुःख (५) पुरातनी पंथ (६) माया का भेद (७) सोहम रामनाम (८) कौन ज्ञानी कौन अज्ञानी (९) अजीत मन (१०) सत्य सनातन (११) जीवात्मानी अरज (१२) स्थुल देहज्ञान.

    उनकी ज्ञानधारा के इन मुदो से उनका विचारवंत पुरुष को कुछ पता लगता है । इससे उनका कुछ हद तक परिचय पा सकते है । पूर्ण परिचय तो गुरुकृपा से ही संभव होता है ।

  7. पीराणा का दुर्लभ अलौकिक दर्शन

    सद्गुरु श्री बलदेवदास महाराज खुद समर्थ होते हुए भी साधारण आदमी की तरह व्यवहार करते हुए उन्होंने धीरज और सहनशीलता से अपना समय कुछ साल तक व्यतित कीया । भक्ति का महिमा बढाते रहे और प्रकाशीत करते रहे । बाद में पीपलीगाँव ‘‘पीर की पीपली’’ के रुप में प्रकाशीत होने का समय आ गया । उनके द्वारा सत्य सनातन धर्म और युग परिवर्तन के अनुसंधान से पीपली में अलौकिक दिव्य सर्जन होने का समय नजदीक आ रहा था । महापुरुष की सत्ता का अनुभव या पहेचान होने का समय समीप आ रहा था ।

    इस बात को लेकर उन्होंने वि.सं. २०४७ में एक सत्संग समारोह में कहा था कि, ‘‘महापुरुष की कोई सायबी, उनकी संपत्ति, उनकी करामत, उनकी लीला, उनका खेल कोई समय पर सेवक समुदाय को कुछ हद तक दृष्टि में देने का मेरा ईरादा है । मेरी ये इच्छा है कि आप सबको महापुरुष की संपत्ति और करामत का जीवन में कुछ लाभ मिले और थोडा कुछ अनुभव भी मिल सके ।

    उनकी ये इच्छानुसार कुछ महिने के बाद पीपली में अलौकिक दैवी घटनाएँ उपस्थित होने लगी । सेवक समुदाय को पीरकी पीराई और शक्ति का आँशिक अनुभव होने लगा । लेकिन शिष्यलोग इन सभी घटनाओं को झेल नहीं पाए और सबके दिमाग में छूपा डर पैदा हो गया था । महापुरुष का वो खेल समज में नहीं आया । उन्होंने पहेले किया हुआ सूचन सब भूल गए थे । हजारो लोगों के बीच मे सब हो रहा था। वो सब बातों का या घटनाओं का जिसने अनुभव किया हो, या सब देखा हो वो ही उसे समज सकता है । उस समय पर सद्गुरु श्री बलदेवदास महाराज मूल्यवान सी बहोत चीजे अग्नि में जला देते थे। मूर्तिओं को खंडित करके जल में समर्पीत करते थे । इस समय दौरान हर दिन हजारों रुपये का प्रसाद बांटा जाता था । लोगों में तर्कवितर्क होने लगा । भली बुरी बाते फैलने लगी । ये गेबी संघर्ष और टक्कर का समय था । श्री बलदेवदास महाराज इन सभी बातों का केन्द्ररुप पुरुष थे ।

    इन सभी बातों को लेकर सद्गुरु श्री बलदेवदास महाराजने इसवीसन १९९२ में सबको जो संबोधन किया था वो उनके परिचय के लिए बहोत मूल्यवान है । इस संबोधन में उनकी ज्ञानधारा, अलौकिक आकाशी गेबी संघर्ष, संघर्ष का हेतु, संत परंपरा, गुरुपद की महत्ता, देवी देवताओं की कार्यवाही का अनुसंधान, आनेवाले समय का संकेत, सेवक की फर्ज और सहायक आज्ञा, पीपलीधाम की भूमिका ये सब बातें भावि के संकेत रूप में समाई हुई है । इस संबोधन में उनकी निखालसता, नम्रता, आधिनता, मक्कमता और महानता जैसे गुण प्रगट होते है ।

    वास्तव में वे खामीरहित होते हुए भी अपनी मानव सहज खासियत को प्रगट करते है और इस संघर्ष के निमित्त कारण रुप अपनी ही कोई भूल या खामी या कमी को दर्शाते हुए गूढ रहस्य के प्रति अंगूलि निर्देश करते है । उन्होंने ही अपने विराट स्वरूप का सबको दर्शन कराके अपना आंशिक परिचय या अनुभव की अनुभूति कराई। इस विराट स्वरूप से सेवकजन तो धबरा गए थे । श्रीकृष्णने अर्जुनजी को विराट स्वरुप का दर्शन कराया तो वो भी घबराकर अपना शीर झूकाकर खडे रह गए थे ।

    महापुरुष का यह स्व-ईच्छित और स्व-रचित संघर्ष करीब तीन महिने तक रातदिन चलता रहा । उसके बाद ये लीला युक्तिपूर्वक समाप्ति की ओर चली । सत्य को प्रकाशीत करने के लिए ये संघर्ष था ।

    इस समय दौरान पीर रामदेवजी महाराज, श्री सवाराम साहब, श्री हंसदास साहब, श्री झबुबाई, श्री जमनामा, श्री काशीमा, श्री नानजी भा, ध्रांगध्रा के नागाजी, श्री मधाजी बापु, श्री देशल भगत, श्री नागरदास बावा, पीर बावा ये सब यहां पर प्रगट हुए थे । इसके अलावा श्री हनुमानजी, वीर, श्री गरुडजी, श्री कालभैरव, श्री शेषनारायण, साखीया, श्री आदशक्ति, श्री वेराई मा, जोगणी मा, मेलडी मा, चामुंडा मा, खोडीयार मा के साथ साथ ओर भी कई देवीदेवता प्रगट हुए थे । यहाँ साहब का दरबार देवीदेवता, महापुरुषो और भक्तो से शोभित हुआ । सद्गुरु श्री बलदेवदास महाराज के साथ सब प्रत्यक्ष रुप में बातचीत करते रहे । उनके पावन चरनो में गेबी शक्तियाँ शीर झूकाती रही । महापुरुषोने भी प्रगट हो कर यहाँ का दिव्य परिचय देनेवाले संदेश सुनाए । यहाँ पर गोपीचंद भरथरी, गोरखनाथ, बावा बालनाथ, जमीयलशा दातार, मारकुंड ऋषि इत्यादि अनेक महापुरुषो का आगमन होने लगा ।

  8. श्री रामदेव पीर का बावन गज का देवल

    श्री रामदेवजी महाराजने श्री सवाराम साहब को जो वचन दिया था उसका प्रतिबिंब या प्रतिभाव श्री झबुबाई के एक पद में दिखाई देता है । श्री झबुबाईने लिखा है कि, ‘‘पीपलीए पीरना बेसणा’’ तो ये शब्द सच होने का समय आ गया । पीपलीधाम में आदशक्ति के स्तंभ का स्थापन वि.सं. २०५१ में होने से और आदशक्ति श्री वेराई मां का देवल भी वि.सं. २०५१ में बनने से अब बाबा रामदेव पीर का बावन गज का देवल उनके वचन अंतर्गत निर्माण करने का निर्णय हुआ । श्री बलदेवदास महाराजने अपने परिवार और यहाँ के मिस्त्री कारीगर श्री गणपतभाई प्रजापति ( मोटा हरिपुरा ) और प्रजापति श्री परसोत्तमभाई प्रजापति ( ध्रांगध्रा ) को इस निर्णय की जानकारी दी गई । और ध्रांगध्रा के सोमपुरा को ये देवल बनाने का काम सोंपा गया ।

    बाद में वि.सं. २०५१ फाल्गुन वद १३ बुधवार दिनांक २९-३-१९९५ के दिन सुबह सवा नव बजे सद्गुरु श्री बलदेवदास महाराज और माताजी ( श्री गोदावरी बा ) के मंगल हाथों से देवल का भूमिपूजन हुआ । उस समय गणपतभाई प्रजापति को देवल बनाने की निमित्तरुप जिम्मेवारी सौंपी गई ।

    बाद में वि.सं. २०५१ चेत सुद १५ शनिवार दिनांक १५-४-१९९५ के दिन सुबह सवा सात बजे देवल का शिलान्यास हुआ । सद्गुरु की प्रेरणा से कार्य में तेजी आई । सेवक लोग भी सेवाकार्य में जूटने लगे । देखते ही देखते सवा दो साल में देवल बन गया । बाद में उसे सुशोभित करने की प्रक्रिया शुरु हुई । अनेकविध मूर्तियाँ और कलात्मक नकशीकाम से देवल सुशोभित हो उठा । देवल में स्थापीत मूर्तियों की विगत इस प्रकार है ।

    अवतार - विष्णु

    ( १ ) कच्छ ( २ ) मत्स्य ( ३ ) वराह ( ४ ) नृसिंह ( ५ ) वामन ( ६ ) परशुराम ( ७ ) राम ( ८ ) कृष्ण ( ९ ) बुद्ध

    नवदुर्गा

    ( १ ) शैल पुत्री ( २ ) स्कंदमाता ( ३ ) कालरात्रि ( ४ ) कात्यायनी ( ५ ) महागौरी ( ६ ) कुष्मांगा ( ७ ) ब्रहमचारिणी ( ८ ) चंद्रघंटा ( ९ ) सिध्धिदात्री

    इसके अलावा महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वति, अन्नपूर्णा देवी और वीणावादिनी के दर्शन होते है ।

    चारो जुग के धर्म के आगेवान

    ( १ ) प्रह्लाद ( २ ) हरिश्चन्द्र ( ३ ) युधिष्ठिर ( ४ ) बलीराजा

    इसके अलावा तीन दिशाओं के देव ( १ ) यम ( २ ) वरुण ( ३ ) दत्तात्रेय और कुबेर, नटराज तथा बलराम की मूर्तियां भी है ।

    चार दिशाओं के चार कोने

    ( १ ) अग्नि ( २ ) नैऋत्य ( ३ ) वायव्य ( ४ ) ईशान

    इसके अलावा ओर भी मूर्ति और प्रतीक है जो इस प्रकार है ।

    ( १ ) अर्धनारेश्वर ( २ ) ऋषि ( ३ ) ऋषि और ऋषि पत्नी ( ४ ) गोपीचंद और भरथरी ( ५ ) विश्वकर्मा ( ६ ) वासुकी नाग ( ७ ) धनवंतरी वैद्य ( ८ ) बटुक भैरव ( ९ ) सुखनाथ का सिंह ( १० ) जोगणी माँ ( ११ ) मेनका अप्सरा ( १२ ) परी ( १३ ) गांधर्व युगल ( १४ ) वाद्य-समूह ( १५ ) गांधर्व ( १६ ) नृत्यांगनाए ( १७ ) दो चोकीदार ( १८ ) द्वारपाल ( १९ ) सेविकाएँ ( २० ) आंबो - ( आम्रपेड ) ( २१ ) वड ( २२ ) कळश ( २३ ) पाट ( २४ ) सूर्य ( २५ ) चंद्र ( २६ ) वीर ( २७ ) साखीया

    इस तरह सिर्फ तीन साल में श्री रामदेव पीर का ये बावन गज का ( १०५ फीट ) देवल निर्मित हुआ । श्री रामदेव पीर बापा की आज्ञा को लेकर, उनकी अनुमति से इसमें अनंत अकळ कलाओं का समन्वय किया गया है कि जिसे सिर्फ ज्ञानी या अनुभवी पुरुष ही समझ पाते है ।

    श्री बलदेवदास महाराज के सानिध्य में और उनके द्वारा बने हुए इस भव्य गजपीठ देवल में चारो जुग का धर्म के बारे में अनुसंधान है। देवल के निर्माण के लिए फंडफाला नहीं किया गया है । ये श्री रामदेवपीर के वचन का प्रताप है ।

    इस दिव्य देवल में बिराजीत होनेवाले रणुजा के राय बाबा रामदेव पीर की मूर्ति राजस्थान के जयपुर शहर में बनवाने का तय हुआ । श्री रामदेवजी महाराजने यहाँ पर हरहंमेश के लिए बैठने का जो वचन दिया था उनके मुताबिक उनकी आसन पर बैठी हुई मूर्ति बनाने का फैंसला लिया गया । कबीर साहब का जो आसन है ऐसे आसनवाली मूर्ति बनाने का सद्गुरु श्री बलदेवदास महाराजने तय कीया । उस आसन में भेद भी है और करामत भी है । अनुभवी पुरुष इसे जान सकते है ।

    श्री बलदेवदास महाराजने इस प्रमुख मूर्ति के अलावा और भी आठ मूर्ति की स्थापना करने का सूचन कीया । वो मूर्ति इस प्रकार है ।

    ( १ ) हरजी भाटी ( २ ) डालीबाई ( ३ ) सगुणाबेन ( ४ ) भानजा गगुभा ( ५ ) गणपति ( ६ ) गरुडजी ( ७ ) कालभैरव ( ८ ) हनुमानजी

  9. देवल के प्रतिष्ठा महोत्सव की तैयारी

    अब देवल के प्रतिष्ठा महोत्सव में पीपली के ग्रामजनो को सहकार के साथ सेवा का लाभ देकर उनको इस प्रसंग में सहयोगी बनाने का श्री बलदेवदास महाराजने फैंसला किया ।

    इस फैंसले के मुताबीक दिनांक १४-१-१९९८ के उत्तरायन के दिन रात के समय पर उन्होंने पीपली के मुस्लीम, पटेल, भरवाड, साधु-संत, हरिजन वगैरह सभी कोम या ज्ञाति के लोगों की सभा का आयोजन किया । इस सभा में उन्होंने प्रसंग की भूमिका और कार्यवाही के बारे में और ग्रामजनों का उत्साह बढे ऐसा सुंदर संबोधन किया । उनके संबोधन के बाद उपस्थित सभी लोगोंने एकजूट होकर इस महापर्व को सफल बनाने के लिए अपना मक्कम ईरादा प्रगट किया ।

    इस संबोधन के दश दिन बाद मूर्तिओं का पीपली में प्रवेश हुआ। मूर्ति आते ही सद्गुरु श्री बलदेवदास महाराजने प्रतिष्ठा पर्व का समय तय कीया । उन्होंने इसके लिए विक्रम संवत २०५४ चेत वद चोथ, पांचम, छठु और गुरुवार, शुक्रवार, शनिवार का समय निर्धारीत किया। मतलब कि इसवीसन १९९८ के अप्रैल माह की १६, १७, १८ तारीख तय की । इसमें चेत वद ५ दिनांक १७-४-१९९८ के दिन प्राण प्रतिष्ठा तय की गई ।

    इस महोत्सव में लाखों की तादात में लोग आने की अपेक्षा रखी गई । इतने बडे आयोजन के लिए समय कम था लेकिन सद्गुरु श्री बलदेवदास महाराजने सबको हिंमत, दिलासा और प्रेरणा देकर मार्गदर्शन दिया ।

    उनकी प्रेरणा से इस महोत्सव की प्रारंभिक प्रक्रिया शुरु हुई । इसके लिए यहाँ ‘‘श्री रामदेव पीर बापा मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव समिति’’ बनाई गई । इस समिति में मंदिर के परिवार के सदस्यो को शामिल किया गया और उन सबको अलग अलग जिम्मेवारी सौंपी गई । इस परिवार के सदस्य ( १ ) श्री महादेवभाई ( पूजारी बापु ) ( २ ) श्री शंकरभाई ( दादा ) ( ३ ) श्री वासुदेव महाराज ( ४ ) श्री प्रविण महाराज ( ५ ) श्री इश्वर महाराज ( ६ ) श्री दलसुख महाराज ( ७ ) श्री मनु महाराज ( ८ ) श्री गोर्विंद महाराज ( ९ ) श्री नरसिंह महाराज और ( १० ) श्री प्रकाश महाराज के साथ साथ उन सबकी अगवानी में सेवक समुदाय भी शामिल हुआ ।

    आयोजन का नकशा तैयार हुआ । इस पर्व के आयोजन में सभी छोटी छोटी बातें और सुविधा पर पूरा ध्यान रखा गया । श्री बलदेवदास महाराज के सानिध्य में इस विशाल आयोजन का प्रारंभ हुआ । इसमें सेवक समुदाय जुट गया । इसके लिए ज्यादा जमीन की आवश्यकता थी । वो काम भी हो गया ।

    विशाल भोजनगृह, सभामंडप, संतो-महंतो के विश्राम की व्यवस्था, यज्ञमंडप, अभ्यागत साधुओं की विश्राम व्यवस्था, वाहन पार्किंग, चाय-पानी की सुविधा, सरकारी ओफिसों के लिए व्यवस्था, आनंदमेला, स्वयंसेवक और सेवक समुदाय की विश्राम व्यवस्था, पूछतास ओफिस, किताब और फोटों की व्यवस्था वगैरह सभी प्रकार की व्यवस्था का आयोजन किया गया । विशाल मंडप का आयोजन हुआ । इन सभी मंडप में इन्टरकोम फोन और वोकीटोकी की व्यवस्था रखी गई । टी.वी. प्रसारण के लिए केमेरा का आयोजन हुआ । विद्युत के लिए बडे बडे जनरेटर रखे गए ताकि सतत बीजली रहे । समग्र विस्तार में इन्दोरवाले की रंगीन रोशनी का प्रबंध किया गया ।

    इस प्रसंग में संतो महंतो को आमंत्रित करने के लिए आकर्षक आमंत्रण पत्रिकाएँ छपवाई गई और गुजरात के सभी प्रदेशो में प्रत्यक्ष जाकर उन्हें आमंत्रित किया गया । अलग अलग गांव और शहरो में बडे बडे बेनर और आमंत्रण पत्रिकाएँ लगाई गई । पीपली के पास हाईवे पर स्वागत कमाने भी बनाई गई ।

    सद्गुरु श्री बलदेवदास महाराजने इस महापावन प्रसंग में भोजन और ठंडे पानी की सुविधा को अहम ( मुख्य, खास ) महत्त्व दिया था। तीनो दिन तक सुबह नव बजे से रात को तीन बजे तक भोजन की सुविधा प्राप्त थी ।

  10. प्रतिष्ठा महोत्सव

    ‘‘पीपळी ए पीरुना बेसणा’’ वो समय अब आ गया । महोत्सव के लिए सभी तैयारीयाँ पूर्ण हुई । चारों ओर से भारी मात्रा में दर्शनार्थीओं का आगमन शुरु हुआ । प्रतिष्ठा महोत्सव समितिने तीन दिन की कार्यसूचि का आयोजन किया था ।

    विष्णु महायाग से मंगल पर्व का मंगल प्रारंभ हुआ । चारो वेद की पूर्णतया मान मर्यादा को ध्यान में रखते हुए श्री सवाराम साहब की नीरगुण-शीरगुण धारा की समानता को साथ में रखते हुए यह विष्णुयाग का आयोजन हुआ था । इनमें यजमान के रूप में गुजरात के अलावा ओर भी प्रांत के लोगोने हिस्सा लिया था । इसके साथ साथ तीन दिन की श्री रामदेव अखंड धून का भी प्रारंभ हुआ । बाद में धर्मसभा का आयोजन था । इस सभा मंच पर बिराजीत हुए बडे बडे संतमहंतोने शोभा को बढावा दिया । सभा मंच के मध्य में सद्गुरु श्री बलदेवदास महाराज अपने विशिष्ट आसन पर बिराजीत हो कर अपनी विशिष्ट प्रतिभा का एहसास करा रहे थे । सब संत-महंतो का पुष्प से सन्मान किया गया । उन सबने सभा में प्रासंगिक संबोधन किया । भजन-सत्संग का कार्यक्रम भी था । गुजरात सौराष्ट्र के नामांकित भजनीक-कलाकार उपस्थित थे । चारो ओर खुशी और भक्तिभाव का माहोल था । भजन, भोजन और सत्संग का संगम था । हरेक संप्रदाय के संतो का दर्शन सुलभ हुआ था । जीवन का ये एक मूल्यवान और यादगार प्रसंग था । रात के समय रंगीन रोशनी के जरीये ये अलौकिक देवभूमि लगती थी । लोग स्वर्गभूमि का एहसास करते थे । इस तरह इस मंगल पर्व का प्रारंभ हुआ ।

    इस मंगल पर्व का दूसरा दिन मूर्ति की प्रतिष्ठा का दिन था । इस समय पर बहोत जानेमाने संत-महंत पधारे थे । जूनागढ के श्री शेरनाथ बापु तो हरद्वार के कुंभमेले में हिस्सा लेके सीधे पीपली पधारे थे । लाखों की तादात में लोग जमा हुए थे । प्रतिष्ठा का समय सुबह सवा नव बजे का था । श्री रामदेवजी महाराज की ईच्छा श्री बलदेवदास महाराज के मंगल हस्त से बिराजीत होने की थी । इसलिये उस दिन सुबह सवा छ बजे श्री बलदेवदास महाराजने देवल के भीतर जाकर कुछ मंगलविधि की ।

    बाद में ठीक सवा नव बजे संतो-महंतो, पीर, फकीर, ओलीया, गेबी, प्रगट, प्रेरीक महापुरुषो, जती-सति - देवी देवता और भाविक भक्तो के बीच जयनाद के साथ श्री रामदेवजी महाराज की ईच्छानुसार श्री बलदेवदास महाराज के पावन हस्तो से अनंत ब्रह्मांडो के नाथ, रणुजा के राय पीर रामदेवजी महाराज की मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा की गई । शंखनाद, घंटनाद, झालर और नगारे के दिव्य ध्वनि के साथ आरती पूजन हुआ । धूप, दीप और अत्तर से हवा सुगंधीत होकर महक उठी । इस प्रमुख मूर्ति के साथ अन्य आठ मूर्तियों की भी स्थापना की गई ।

    गगन मंडल की मुक्त हवा में विश्व के अद्वितीय बावन गज के गजपीठ देवल पर बावन गज का हरे रंग का ध्वज ( नेजो ) लहेराया गया । गगन मंडल से पुष्पक विमान के झरीये करीब एक घंटे तक इस देवल और गाँव पर सुवासित फूलो की बोछार होती रही । लोग इन पुष्पो को अपनी एक याद के लिए घर पर ले गए । सद्गुरु श्री बलदेवदास महाराजने एक बार कहा था कि, ‘‘पीर रामदेवजी महाराज जब पोकरणगढ पधारे थे तब जो ठठमाठ था इससे अधिक ठठमाठ यहाँ पर दिखेगा। और हुआ भी वैसा । दर्शन के लिए बहोत भीड जमा हुई । लम्बी लम्बी कतारे लगी । फिर भी श्री रामदेवजी महाराज की कृपा से सब कुछ अच्छी तरह से संपन्न हुआ । पुलीस को कोई भी प्रकार का बलप्रयोग करना न पडा ।

    तीसरा दिन प्रसंग की पूर्णाहुति दिन था । इस समय धर्मसभा में संतो-महंतो के अलावा राजकीय पदाधिकारी भी पधारे थे । यह अंतिम दिन था । इस महोत्सव में पधारे हुए सब संतो-महंतो को और साधु संत फकीर को धर्म की परंपरा के मुताबीक शाल अर्पण करके भेटपूजा का विवेक किया गया था ।

    प्रतिष्ठा महोत्सव समापन होने के बाद श्री बलदेवदास महाराजने ईच्छा जताई कि श्री रामदेवजी महाराज का प्रसाद सब जगह बांटा जाय। उनकी ये ईच्छा और आज्ञा से बुंदी और गांठीया का प्रसाद गुजरात और सौराष्ट्र के दूर दूर तक के गांवो और शहरो में बाँटा गया । पीपली गांव के पास हाईवे परसे भी गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, दिल्ही इत्यादि प्रदेशो में भी ट्रक के द्वारा और अन्य छोटे बडे वाहन द्वारा ये प्रसाद बांटा गया । ये प्रक्रिया बहोत दिनो तक चलती रही ।

    इस तरह सिर्फ तीन साल में बना हुआ इस देवल का प्रतिष्ठा महोत्सव दिव्य ठाठमाठ और बडी धामधूम से परिपूर्ण सफलता के साथ समाप्त हुआ । सद्गुरु श्री बलदेवदास महाराजने इस बडे प्रसंग में पानी की जरुरत देखते हुए पहेले से ही बजाणा गाँव में पानी का बोर बनवाया था ।

  11. श्री रामदेव पीर के विसामे देवल का प्रतिष्ठा महोत्सव

    पीपली में श्री रामदेव पीर के देवल का प्रतिष्ठामहोत्सव समाप्त होने के बाद श्री बलदेवदास महाराज हस्तक ‘‘श्री रामदेव पीरनो विसामो’’ नामक स्थान में श्री रामदेवजी महाराज का घोडेस्वार मूर्तिवाला देवल बना है । यहाँ भी विष्णुयाग करके मूर्ति का प्राणप्रतिष्ठामहोत्सव वि.सं. २०५६ फाल्गुन सुद ७ रविवार दिनांक १२-३-२००० के दिन साधु-संत-महंत और भक्तो की भारी भीड के बीच सफलतापूर्वक मनाया गया था । दोपहर का एक बजकर पंद्रह मिनट का समय था। यहां भी फूलो की वर्षा हुई थी । पधारे हुए सभी लोगों ने भजन-सत्संग, दर्शन और भोजन प्रसाद का लाभ लीया था । साधु, संतो और महंतो को भेटपूजा का विवेक किया गया था ।

    इसके अलावा इस विसामे के स्थान पर एक पुराने शिवालय का जमीन में से कुछ अवशेष मिले । श्री बलदेवदास महाराजने इस शिवालय को पाया में से उठाकर उसे नया रुपरंग देकर इस शिवालय को पूर्ण रुप से नया शिवालय बना दीया । रुद्रयाग करके इसकी प्रतिष्ठा विधि की गई थी । इस विसामे के स्थान पर गौशाला और रामासरोवर का भी उनके हाथो निर्माण हुआ है ।

    इसके अलावा भैरवा राक्षस का जुल्म हटाने के लिए श्री रामदेवजी महाराजने पोकरणगढ में एक गुफा में भैरवा को खदेडकर बंद कर दिया था । वो भैरवनाथ की गुफा यहाँ पीपलीधाम में श्री बलदेवदास महाराज हस्तक बनी है । भैरवनाथ की मूर्ति के प्रतिष्ठा समय पर भैरवनाथ खुद प्रगट हो कर पधारे थे । इसके अलावा पीपलीधाम में श्री शेषनारायण भगवान का मंदिर, सद्गुरु श्री सवाराम आश्रम, श्री झबुबाई आश्रम, श्री नकलंक आश्रम ( जिसमें नकलंक भगवान का स्थान है ) विशाल भोजनशाला इत्यादि श्री बलदेवदास महाराज के हस्तक ही निर्माण हुए है ।

  12. संकेत के साथ समापन

    भक्तराज श्री बलदेवदास महाराज के आगमन का कारण-कार्य का संकेत उनकी बहुविध कार्यवाही में देखा जा सकता है । श्री सवाराम साहब के समय में यहां सिर्फ श्री द्वारकाधीश रामदेव पीर का मंदिर था। लेकिन बाद में उपरोक्त सभी कार्यवाही श्री बलदेवदास महाराज के समय में उनके हस्तक हुई है । विश्व में आजतक ऐसा कोई पुरुष नहीं है कि जिसने अपने ही गाँवमें, अपनी ही प्रागट्यभूमि में ऐसा दिव्य सर्जन करके तीर्थधाम बना दीया हो ! गुरुवाई पद, पीराणा और शक्ति ऐसे यहाँ के तीन स्तंभ के साथ बहोत गेबी शक्ति का समन्वय हुआ है । ये तीनों का संबंध और अनुसंधान श्री बलदेवदास महाराज के साथ संकलीत है । यहां भक्ति, ज्ञान, और कर्म का सुभग मिलन और समन्वय है ।

    सद्गुरु पद में पूर्णतया पीराई छीपी रही है । वोही पीर है । वोही नकलंक है । नकलंक का मतलब कलंकरहित । नकलंक को नकलंक साहब भी कह सकते है । निर्विकारी पद वोही नकलंक है । नकलंक को अमरपुरुष या सतपुरुष भी कह सकते है । संतो के मतानुसार अब नकलंक अवतार की ईन्साफी कार्यवाही का समय है । सत्य सनातन धर्म के अनुसंधान से ये अविनाशी दशवे अवतार की कार्यवाही का संकेत महापुरुषो की वाणी द्वारा मिलते है । परमात्मा को याद करने का समय है । उसीके नाम से बचाव हो सकता है ।

    आज तो पीपलीधाम में भक्तराज श्री वासुदेव महाराज बीराजमान है । ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु श्री बलदेवदास महाराजने वि.सं. २०५९ मार्गशीर्ष १३ मंगलवार दिनांक १७-१२-२००२ के दिन अपने नाशवंत लेकिन पावन पार्थिव देह का त्याग किया । देह से इस दुनिया को छोड चले ।

    बाद में उनके ज्येष्ठ सुपुत्र एवम् शिष्य श्री वासुदेव महाराज को सद्गुरु श्री बलदेवदास महाराज की ईच्छानुसार और श्री रामदेवजी महाराज और साहब की कृपा से, संतो महंतो के आशीर्वाद से और अपने परिवार की पूर्ण सहमति के साथ ४४ साल की आयु में गुरुगादी अर्पित की गई । उनको सबकी सहमति और प्रेम से बिराजीत किया गया । अब उनके द्वारा पीपलीधाम की प्रगति तेजीसे आगे बढ रही है । चारों ओर उनका नाम आदर से लिया जाता है । पीपलीधाम धर्मक्षेत्र के रुप में आज उभर रहा है । श्री वासुदेव महाराजने धर्मसभाओ में अपनी आध्यात्मिक ज्ञानधारा और संबोधन की शैली से सबको प्रभावित किया है । धर्मक्षेत्र में उनकी प्रतिभा और व्यक्तित्व नीखर रहा है ।

    उनकी कार्यवाही में उनका पूरा परिवार एक जूट हो गया है । श्री पूजारी बापु ( श्री महादेवभाई ) उनके सुपुत्र श्री ईश्वर महाराज ( मुखी ), श्री मनु महाराज तथा श्री शंकरभाई ( दादा ) और उनके सुपुत्र श्री गोर्विंद महाराज, श्री नरसिंह महाराज और श्री प्रकाश महाराज, उनके अलावा श्री प्रविण महाराज ( जिनका सतलोकवास हुआ है ) और उनके सुपुत्र श्री गौतम महाराज और श्री वासुदेव महाराज के सुपुत्र श्री भूपेन्द्र महाराज ये सब यहाँ की कार्यवाही के हिस्सेदार बनके, अपनी सेवाकीय फर्ज को नीभाते हुए सद्गुरु श्री वासुदेव महाराज की आज्ञा का पालन करते हुए संगीन साथ नीभा रहे है । परिवार की एकता का ज्वलंत प्रतीक बनके उत्तम उदाहरण का नमूना पेश कर रहे है । ऐसा परिवार वंदनीय हो जाता है ।

    सद्गुरु श्री वासुदेव महाराज और श्री रामदेवजी महाराज के चरणों में कोटी कोटी प्रणाम और ऐसे परिवार को वंदन.

श्री सद्गुरु देव की जय श्री रामदेवजी महाराज की जय