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श्री रामदेवपीर पीठ - पीपलीधाम

बावनगज के देवल का निर्माण और भव्य प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव की गाथा।

  1. श्री रामदेव पीर का बावन गज का देवल

    श्री रामदेवजी महाराजने श्री सवाराम साहब को जो वचन दिया था उसका प्रतिबिंब या प्रतिभाव श्री झबुबाई के एक पद में दिखाई देता है । श्री झबुबाईने लिखा है कि, ‘‘पीपलीए पीरना बेसणा’’ तो ये शब्द सच होने का समय आ गया । पीपलीधाम में आदशक्ति के स्तंभ का स्थापन वि.सं. २०५१ में होने से और आदशक्ति श्री वेराई मां का देवल भी वि.सं. २०५१ में बनने से अब बाबा रामदेव पीर का बावन गज का देवल उनके वचन अंतर्गत निर्माण करने का निर्णय हुआ । श्री बलदेवदास महाराजने अपने परिवार और यहाँ के मिस्त्री कारीगर श्री गणपतभाई प्रजापति ( मोटा हरिपुरा ) और प्रजापति श्री परसोत्तमभाई प्रजापति ( ध्रांगध्रा ) को इस निर्णय की जानकारी दी गई । और ध्रांगध्रा के सोमपुरा को ये देवल बनाने का काम सोंपा गया ।

    बाद में वि.सं. २०५१ फाल्गुन वद १३ बुधवार दिनांक २९-३-१९९५ के दिन सुबह सवा नव बजे सद्गुरु श्री बलदेवदास महाराज और माताजी ( श्री गोदावरी बा ) के मंगल हाथों से देवल का भूमिपूजन हुआ । उस समय गणपतभाई प्रजापति को देवल बनाने की निमित्तरुप जिम्मेवारी सौंपी गई ।

    बाद में वि.सं. २०५१ चेत सुद १५ शनिवार दिनांक १५-४-१९९५ के दिन सुबह सवा सात बजे देवल का शिलान्यास हुआ । सद्गुरु की प्रेरणा से कार्य में तेजी आई । सेवक लोग भी सेवाकार्य में जूटने लगे । देखते ही देखते सवा दो साल में देवल बन गया । बाद में उसे सुशोभित करने की प्रक्रिया शुरु हुई । अनेकविध मूर्तियाँ और कलात्मक नकशीकाम से देवल सुशोभित हो उठा । देवल में स्थापीत मूर्तियों की विगत इस प्रकार है ।

    अवतार - विष्णु

    ( १ ) कच्छ ( २ ) मत्स्य ( ३ ) वराह ( ४ ) नृसिंह ( ५ ) वामन ( ६ ) परशुराम ( ७ ) राम ( ८ ) कृष्ण ( ९ ) बुद्ध

    नवदुर्गा

    ( १ ) शैल पुत्री ( २ ) स्कंदमाता ( ३ ) कालरात्रि ( ४ ) कात्यायनी ( ५ ) महागौरी ( ६ ) कुष्मांगा ( ७ ) ब्रहमचारिणी ( ८ ) चंद्रघंटा ( ९ ) सिध्धिदात्री

    इसके अलावा महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वति, अन्नपूर्णा देवी और वीणावादिनी के दर्शन होते है ।

    चारो जुग के धर्म के आगेवान

    ( १ ) प्रह्लाद ( २ ) हरिश्चन्द्र ( ३ ) युधिष्ठिर ( ४ ) बलीराजा

    इसके अलावा तीन दिशाओं के देव ( १ ) यम ( २ ) वरुण ( ३ ) दत्तात्रेय और कुबेर, नटराज तथा बलराम की मूर्तियां भी है ।

    चार दिशाओं के चार कोने

    ( १ ) अग्नि ( २ ) नैऋत्य ( ३ ) वायव्य ( ४ ) ईशान

    इसके अलावा ओर भी मूर्ति और प्रतीक है जो इस प्रकार है ।

    ( १ ) अर्धनारेश्वर ( २ ) ऋषि ( ३ ) ऋषि और ऋषि पत्नी ( ४ ) गोपीचंद और भरथरी ( ५ ) विश्वकर्मा ( ६ ) वासुकी नाग ( ७ ) धनवंतरी वैद्य ( ८ ) बटुक भैरव ( ९ ) सुखनाथ का सिंह ( १० ) जोगणी माँ ( ११ ) मेनका अप्सरा ( १२ ) परी ( १३ ) गांधर्व युगल ( १४ ) वाद्य-समूह ( १५ ) गांधर्व ( १६ ) नृत्यांगनाए ( १७ ) दो चोकीदार ( १८ ) द्वारपाल ( १९ ) सेविकाएँ ( २० ) आंबो - ( आम्रपेड ) ( २१ ) वड ( २२ ) कळश ( २३ ) पाट ( २४ ) सूर्य ( २५ ) चंद्र ( २६ ) वीर ( २७ ) साखीया

    इस तरह सिर्फ तीन साल में श्री रामदेव पीर का ये बावन गज का ( १०५ फीट ) देवल निर्मित हुआ । श्री रामदेव पीर बापा की आज्ञा को लेकर, उनकी अनुमति से इसमें अनंत अकळ कलाओं का समन्वय किया गया है कि जिसे सिर्फ ज्ञानी या अनुभवी पुरुष ही समझ पाते है ।

    श्री बलदेवदास महाराज के सानिध्य में और उनके द्वारा बने हुए इस भव्य गजपीठ देवल में चारो जुग का धर्म के बारे में अनुसंधान है। देवल के निर्माण के लिए फंडफाला नहीं किया गया है । ये श्री रामदेवपीर के वचन का प्रताप है ।

    इस दिव्य देवल में बिराजीत होनेवाले रणुजा के राय बाबा रामदेव पीर की मूर्ति राजस्थान के जयपुर शहर में बनवाने का तय हुआ । श्री रामदेवजी महाराजने यहाँ पर हरहंमेश के लिए बैठने का जो वचन दिया था उनके मुताबिक उनकी आसन पर बैठी हुई मूर्ति बनाने का फैंसला लिया गया । कबीर साहब का जो आसन है ऐसे आसनवाली मूर्ति बनाने का सद्गुरु श्री बलदेवदास महाराजने तय कीया । उस आसन में भेद भी है और करामत भी है । अनुभवी पुरुष इसे जान सकते है ।

    श्री बलदेवदास महाराजने इस प्रमुख मूर्ति के अलावा और भी आठ मूर्ति की स्थापना करने का सूचन कीया । वो मूर्ति इस प्रकार है ।

    ( १ ) हरजी भाटी ( २ ) डालीबाई ( ३ ) सगुणाबेन ( ४ ) भानजा गगुभा ( ५ ) गणपति ( ६ ) गरुडजी ( ७ ) कालभैरव ( ८ ) हनुमानजी

  2. देवल के प्रतिष्ठा महोत्सव की तैयारी

    अब देवल के प्रतिष्ठा महोत्सव में पीपली के ग्रामजनो को सहकार के साथ सेवा का लाभ देकर उनको इस प्रसंग में सहयोगी बनाने का श्री बलदेवदास महाराजने फैंसला किया ।

    इस फैंसले के मुताबीक दिनांक १४-१-१९९८ के उत्तरायन के दिन रात के समय पर उन्होंने पीपली के मुस्लीम, पटेल, भरवाड, साधु-संत, हरिजन वगैरह सभी कोम या ज्ञाति के लोगों की सभा का आयोजन किया । इस सभा में उन्होंने प्रसंग की भूमिका और कार्यवाही के बारे में और ग्रामजनों का उत्साह बढे ऐसा सुंदर संबोधन किया । उनके संबोधन के बाद उपस्थित सभी लोगोंने एकजूट होकर इस महापर्व को सफल बनाने के लिए अपना मक्कम ईरादा प्रगट किया ।

    इस संबोधन के दश दिन बाद मूर्तिओं का पीपली में प्रवेश हुआ। मूर्ति आते ही सद्गुरु श्री बलदेवदास महाराजने प्रतिष्ठा पर्व का समय तय कीया । उन्होंने इसके लिए विक्रम संवत २०५४ चेत वद चोथ, पांचम, छठु और गुरुवार, शुक्रवार, शनिवार का समय निर्धारीत किया। मतलब कि इसवीसन १९९८ के अप्रैल माह की १६, १७, १८ तारीख तय की । इसमें चेत वद ५ दिनांक १७-४-१९९८ के दिन प्राण प्रतिष्ठा तय की गई ।

    इस महोत्सव में लाखों की तादात में लोग आने की अपेक्षा रखी गई । इतने बडे आयोजन के लिए समय कम था लेकिन सद्गुरु श्री बलदेवदास महाराजने सबको हिंमत, दिलासा और प्रेरणा देकर मार्गदर्शन दिया ।

    उनकी प्रेरणा से इस महोत्सव की प्रारंभिक प्रक्रिया शुरु हुई । इसके लिए यहाँ ‘‘श्री रामदेव पीर बापा मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव समिति’’ बनाई गई । इस समिति में मंदिर के परिवार के सदस्यो को शामिल किया गया और उन सबको अलग अलग जिम्मेवारी सौंपी गई । इस परिवार के सदस्य ( १ ) श्री महादेवभाई ( पूजारी बापु ) ( २ ) श्री शंकरभाई ( दादा ) ( ३ ) श्री वासुदेव महाराज ( ४ ) श्री प्रविण महाराज ( ५ ) श्री इश्वर महाराज ( ६ ) श्री दलसुख महाराज ( ७ ) श्री मनु महाराज ( ८ ) श्री गोर्विंद महाराज ( ९ ) श्री नरसिंह महाराज और ( १० ) श्री प्रकाश महाराज के साथ साथ उन सबकी अगवानी में सेवक समुदाय भी शामिल हुआ ।

    आयोजन का नकशा तैयार हुआ । इस पर्व के आयोजन में सभी छोटी छोटी बातें और सुविधा पर पूरा ध्यान रखा गया । श्री बलदेवदास महाराज के सानिध्य में इस विशाल आयोजन का प्रारंभ हुआ । इसमें सेवक समुदाय जुट गया । इसके लिए ज्यादा जमीन की आवश्यकता थी । वो काम भी हो गया ।

    विशाल भोजनगृह, सभामंडप, संतो-महंतो के विश्राम की व्यवस्था, यज्ञमंडप, अभ्यागत साधुओं की विश्राम व्यवस्था, वाहन पार्किंग, चाय-पानी की सुविधा, सरकारी ओफिसों के लिए व्यवस्था, आनंदमेला, स्वयंसेवक और सेवक समुदाय की विश्राम व्यवस्था, पूछतास ओफिस, किताब और फोटों की व्यवस्था वगैरह सभी प्रकार की व्यवस्था का आयोजन किया गया । विशाल मंडप का आयोजन हुआ । इन सभी मंडप में इन्टरकोम फोन और वोकीटोकी की व्यवस्था रखी गई । टी.वी. प्रसारण के लिए केमेरा का आयोजन हुआ । विद्युत के लिए बडे बडे जनरेटर रखे गए ताकि सतत बीजली रहे । समग्र विस्तार में इन्दोरवाले की रंगीन रोशनी का प्रबंध किया गया ।

    इस प्रसंग में संतो महंतो को आमंत्रित करने के लिए आकर्षक आमंत्रण पत्रिकाएँ छपवाई गई और गुजरात के सभी प्रदेशो में प्रत्यक्ष जाकर उन्हें आमंत्रित किया गया । अलग अलग गांव और शहरो में बडे बडे बेनर और आमंत्रण पत्रिकाएँ लगाई गई । पीपली के पास हाईवे पर स्वागत कमाने भी बनाई गई ।

    सद्गुरु श्री बलदेवदास महाराजने इस महापावन प्रसंग में भोजन और ठंडे पानी की सुविधा को अहम ( मुख्य, खास ) महत्त्व दिया था। तीनो दिन तक सुबह नव बजे से रात को तीन बजे तक भोजन की सुविधा प्राप्त थी ।

  3. प्रतिष्ठा महोत्सव

    ‘‘पीपळी ए पीरुना बेसणा’’ वो समय अब आ गया । महोत्सव के लिए सभी तैयारीयाँ पूर्ण हुई । चारों ओर से भारी मात्रा में दर्शनार्थीओं का आगमन शुरु हुआ । प्रतिष्ठा महोत्सव समितिने तीन दिन की कार्यसूचि का आयोजन किया था ।

    विष्णु महायाग से मंगल पर्व का मंगल प्रारंभ हुआ । चारो वेद की पूर्णतया मान मर्यादा को ध्यान में रखते हुए श्री सवाराम साहब की नीरगुण-शीरगुण धारा की समानता को साथ में रखते हुए यह विष्णुयाग का आयोजन हुआ था । इनमें यजमान के रूप में गुजरात के अलावा ओर भी प्रांत के लोगोने हिस्सा लिया था । इसके साथ साथ तीन दिन की श्री रामदेव अखंड धून का भी प्रारंभ हुआ । बाद में धर्मसभा का आयोजन था । इस सभा मंच पर बिराजीत हुए बडे बडे संतमहंतोने शोभा को बढावा दिया । सभा मंच के मध्य में सद्गुरु श्री बलदेवदास महाराज अपने विशिष्ट आसन पर बिराजीत हो कर अपनी विशिष्ट प्रतिभा का एहसास करा रहे थे । सब संत-महंतो का पुष्प से सन्मान किया गया । उन सबने सभा में प्रासंगिक संबोधन किया । भजन-सत्संग का कार्यक्रम भी था । गुजरात सौराष्ट्र के नामांकित भजनीक-कलाकार उपस्थित थे । चारो ओर खुशी और भक्तिभाव का माहोल था । भजन, भोजन और सत्संग का संगम था । हरेक संप्रदाय के संतो का दर्शन सुलभ हुआ था । जीवन का ये एक मूल्यवान और यादगार प्रसंग था । रात के समय रंगीन रोशनी के जरीये ये अलौकिक देवभूमि लगती थी । लोग स्वर्गभूमि का एहसास करते थे । इस तरह इस मंगल पर्व का प्रारंभ हुआ ।

    इस मंगल पर्व का दूसरा दिन मूर्ति की प्रतिष्ठा का दिन था । इस समय पर बहोत जानेमाने संत-महंत पधारे थे । जूनागढ के श्री शेरनाथ बापु तो हरद्वार के कुंभमेले में हिस्सा लेके सीधे पीपली पधारे थे । लाखों की तादात में लोग जमा हुए थे । प्रतिष्ठा का समय सुबह सवा नव बजे का था । श्री रामदेवजी महाराज की ईच्छा श्री बलदेवदास महाराज के मंगल हस्त से बिराजीत होने की थी । इसलिये उस दिन सुबह सवा छ बजे श्री बलदेवदास महाराजने देवल के भीतर जाकर कुछ मंगलविधि की ।

    बाद में ठीक सवा नव बजे संतो-महंतो, पीर, फकीर, ओलीया, गेबी, प्रगट, प्रेरीक महापुरुषो, जती-सति - देवी देवता और भाविक भक्तो के बीच जयनाद के साथ श्री रामदेवजी महाराज की ईच्छानुसार श्री बलदेवदास महाराज के पावन हस्तो से अनंत ब्रह्मांडो के नाथ, रणुजा के राय पीर रामदेवजी महाराज की मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा की गई । शंखनाद, घंटनाद, झालर और नगारे के दिव्य ध्वनि के साथ आरती पूजन हुआ । धूप, दीप और अत्तर से हवा सुगंधीत होकर महक उठी । इस प्रमुख मूर्ति के साथ अन्य आठ मूर्तियों की भी स्थापना की गई ।

    गगन मंडल की मुक्त हवा में विश्व के अद्वितीय बावन गज के गजपीठ देवल पर बावन गज का हरे रंग का ध्वज ( नेजो ) लहेराया गया । गगन मंडल से पुष्पक विमान के झरीये करीब एक घंटे तक इस देवल और गाँव पर सुवासित फूलो की बोछार होती रही । लोग इन पुष्पो को अपनी एक याद के लिए घर पर ले गए । सद्गुरु श्री बलदेवदास महाराजने एक बार कहा था कि, ‘‘पीर रामदेवजी महाराज जब पोकरणगढ पधारे थे तब जो ठठमाठ था इससे अधिक ठठमाठ यहाँ पर दिखेगा। और हुआ भी वैसा । दर्शन के लिए बहोत भीड जमा हुई । लम्बी लम्बी कतारे लगी । फिर भी श्री रामदेवजी महाराज की कृपा से सब कुछ अच्छी तरह से संपन्न हुआ । पुलीस को कोई भी प्रकार का बलप्रयोग करना न पडा ।

    तीसरा दिन प्रसंग की पूर्णाहुति दिन था । इस समय धर्मसभा में संतो-महंतो के अलावा राजकीय पदाधिकारी भी पधारे थे । यह अंतिम दिन था । इस महोत्सव में पधारे हुए सब संतो-महंतो को और साधु संत फकीर को धर्म की परंपरा के मुताबीक शाल अर्पण करके भेटपूजा का विवेक किया गया था ।

    प्रतिष्ठा महोत्सव समापन होने के बाद श्री बलदेवदास महाराजने ईच्छा जताई कि श्री रामदेवजी महाराज का प्रसाद सब जगह बांटा जाय। उनकी ये ईच्छा और आज्ञा से बुंदी और गांठीया का प्रसाद गुजरात और सौराष्ट्र के दूर दूर तक के गांवो और शहरो में बाँटा गया । पीपली गांव के पास हाईवे परसे भी गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, दिल्ही इत्यादि प्रदेशो में भी ट्रक के द्वारा और अन्य छोटे बडे वाहन द्वारा ये प्रसाद बांटा गया । ये प्रक्रिया बहोत दिनो तक चलती रही ।

    इस तरह सिर्फ तीन साल में बना हुआ इस देवल का प्रतिष्ठा महोत्सव दिव्य ठाठमाठ और बडी धामधूम से परिपूर्ण सफलता के साथ समाप्त हुआ । सद्गुरु श्री बलदेवदास महाराजने इस बडे प्रसंग में पानी की जरुरत देखते हुए पहेले से ही बजाणा गाँव में पानी का बोर बनवाया था ।