पोकरण गढ़ में प्रागट्य
भव्य सांस्कृतिक विरासत और परंपरा रखने वाला भारत देश विश्व का अति प्राचीन, पवित्र और महान धर्मप्रधान देश है। वह बहुत विविधता, विपुलता और विशालता रखने वाला, धर्मक्षेत्र में गौरवशाली भूतकाल की भव्य गाथा रखने वाला धन्य देश है। महापुरुषों ने धरती के नौ खंडों में भारत खंड को सबसे कीमती, महान और परम हितकारी कहा है। उसे महामूल्य रत्नों की खान के रूप में सराहा है।
इस पवित्र भूमि में रत्न समान जैसे और जितने महापुरुष प्रगट हुए हैं, वैसे और उतने महापुरुष अन्यत्र कहीं प्रगट नहीं हुए और समय-समय पर प्रगट होते रहते हैं। इस कायानगरी में भी गगनमंडल की भूमिका को महापुरुष भारतखंड कहते हैं। उस भूमिका में प्रकाशित होकर अनेक महापुरुषों ने विश्व को कल्याणकारी राह दिखाई है और दिखाते रहेंगे।
इस भारतभूमि में भक्तों को दिए गए कोल-करार के अनुसंधान में धर्म और संतों की रक्षा हेतु सत्वगुणी विष्णु परमात्मा के अवतार हुए हैं और होते रहते हैं। ऐसे ही कोल-करार के अनुसंधान में पीपलीधाम में प्रगट दिव्य बावन गज के देवल में अपने राजसिंहासन पर विराजित प्रगट रणुंजा के राय पीर रामदेवजी महाराज का इस लोक में हुआ आगमन अति दिव्य, अलौकिक और परम कल्याणकारी है।
पहले से ही विश्व की आध्यात्मिक शक्ति के केंद्र में रहे भारतवर्ष की पश्चिमी धरा पर राजस्थान की भूमि पर मारवाड़ प्रांत स्थित है। पहले वहाँ पोकरणगढ़ का राज्य था। उस पोकरणगढ़ में तुंवर कुल के अजमल राजा राज्य करते थे। इस प्रदेश में भैरव नाम के राक्षस का बहुत त्रास था। उसकी ताकत और शक्ति इतनी थी कि जहाँ वह रहता था, उस क्षेत्र को उसने वीरान कर डाला था। बारह-बारह गाऊ तक उसकी हाँक गूँजती थी। उतने क्षेत्र में मनुष्य, पशु, पक्षी — सभी का वह आहार करता और परिणामस्वरूप उस भूमि पर कोई रहता नहीं, रह सकता नहीं था। साधु-संत भी उसके त्रास और ताप से मुक्त नहीं रहे थे। सभी के लिए वह संकटरूप था। इसलिए इस भूमि को भैरव के भय से मुक्त करवाने हेतु संत हर समय परमात्मा से प्रार्थना करते थे।
इसके अतिरिक्त उस समय विधर्मी, धर्मांध शासकों द्वारा धर्मांतरण और वटालने की प्रवृत्ति भी पनप रही थी। इसलिए स्व-धर्म को सँभालना, बचाना, टिकाना कठिन था। इस समय हर आत्मा की पुकार थी कि, 'प्रभु, अब आप शीघ्र पधारो, कठिन समय है, तो वातावरण को अनुकूल बनाने तथा धर्म और संतों की रक्षा के लिए आप अवतार धारण करो....'
प्रजा की पुकार थी। साधु-संतों और सज्जनों की प्रभु को सदा थी। परमात्मा ने धर्म के लिए और संतों की रक्षा के लिए अवतार धारण करने का वचन दिया है। अपने वचन के अनुसार सुपात्र को निमित्त बनाकर, कोई कारण उपस्थित करके, निमित्त का निर्माण करके उनका आगमन होता देखा जाता है। उन्हें आना हो, प्रगट होना हो, तो उस समय का वातावरण और समय-संजोग भी वैसे ही रच जाते हैं।
पोकरणगढ़ के राजा अजमलजी को कोई संतान नहीं थी। उनकी धर्मपत्नी का नाम मीणलदे था। दोनों बहुत धार्मिक और संस्कारी थे। कहा जाता है कि वे नंद-यशोदा के अवतार थे। भारतीय समाज में विवाह के बाद यदि बहुत समय बीत जाए और बालक न हो तो उसे बाँझ कहते हैं और बाँझ होना मानो समाज का एक प्रकार का अपराध बन जाता है। उसे बाँझपन का मेहणा लग जाता है। लोग उनका शकुन नहीं लेते। लोग यदि शुभ कार्य के लिए प्रयाण कर रहे हों और ऐसे बाँझ लोग सामने मिलें तो उसे अपशकुन मानकर निराश होते हैं और मन में उनके प्रति तिरस्कार की भावना पैदा होती है।
अजमलराय भी उससे बचे नहीं रह सके। प्रजा में सुगबुगाहट थी। यद्यपि अपना संस्कारी राजा निःसंतान होने का प्रजा को भी दुःख तो लगता था। फिर भी लोगों में असंतोष व्यापक दिखाई देता था। प्रजा कटु वचन भी उच्चारती। उनका कोई शकुन नहीं लेता था। प्रजा के अविवेकी और अपमानजनक शब्द अजमलजी के कानों में पड़े। उनके हृदय को बहुत ठेस पहुँची। मन ही मन बहुत दुःखी हुए। भीतर बहुत हताशा व्याप गई।
उन्होंने इसका हल और उपाय अपने गुरु महाराज से पूछा। गुरु महाराज ने उन्हें ढाढ़स बँधाकर प्रेम से उपाय बताते हुए कहा कि, 'तुम द्वारकाधीश के दर्शन को जाओ और उन्हें जैसे भी हो रिझाओ; यदि तुम्हारी शुद्ध भावना और भक्ति होगी तो वे रीझेंगे और अवश्य इसका रास्ता सुझाएँगे। द्वारका के नाथ निवाजेंगे तो कार्य सफल बनेगा और तुम्हारा बाँझपन का मेहणा टलेगा। फिर जैसा तुम्हारा विश्वास, जैसी तुम्हारी भावना और जैसा तुम्हारा भाग्य...'
इस वार्तालाप और मार्गदर्शन के अनुसंधान में अजमलराय ने हर पूनम को द्वारका जाने का निश्चय किया। अब विचार करो कि कहाँ मारवाड़ प्रांत का पोकरणगढ़ और कहाँ द्वारका! उस समय वाहन-व्यवहार की आधुनिक सुविधा के अभाव में उन दोनों के बीच कितना अधिक अंतर कहा जाए! पर अब वह अंतर मिटने वाला होगा, जिससे उन्हें हर पूनम को द्वारका जाने का संकल्प हुआ। हर महीने ऐसा लंबा अंतर तय करना उस ज़माने में कितना कठिन और मुसीबतरूप होगा! आज तो तेज़ वाहन-व्यवहार इतना है कि सुबह जाकर शाम को वापस आ सकें। जबकि उस समय तो दिन निकल जाते थे। फिर भी एक दृढ़ संकल्प था।
उन्होंने मन ही मन निश्चय किया कि हर पूनम को जाना और यदि बाँझपन का मेहणा न टले तो वहीं प्राणत्याग करना, पर पोकरणगढ़ वापस न आना।
इस प्रकार हर पूनम को नियम के अनुसार अजमलराय द्वारकाधीश के दर्शन को जाने लगे और उन्हें अपना बाँझपन का मेहणा टालने की आजीजी करने लगे, प्रार्थना करने लगे। हर पूनम को इस तरह जाकर उन्होंने बहुत चक्कर लगाए, पर उसमें उन्हें कोई सफलता दिखाई नहीं देती थी और उनका जो धीरज था, उस धीरज का अंत आ रहा था। उनसे अब अधिक समय यह सहन हो सके ऐसा नहीं था। उनकी सहनशीलता की हद आ गई थी।
अब उनके भीतर का समय पूर्ण होने आया था। परमात्मा के आगमन का समय अब रच चुका था और उसके फलस्वरूप अजमलजी के हृदय में बहुत बेचैनी व्यापी। उन्होंने आखिर संकल्प किया कि अब इस बार यदि वे मेरी आजीजी न सुनें तो अंत में वहीं प्राणत्याग करना, पर वापस पोकरणगढ़ न जाना।
इस प्रकार मन ही मन दृढ़ निश्चय करके वे अपना द्वारका का यह अंतिम फेरा मानकर द्वारका जाने निकले। पूनम के दिन वे द्वारकाधीश के मंदिर में आए। द्वारकाधीश के सन्मुख जल की झारी भरकर खड़े रहे और प्रार्थना, स्तुति, वंदना करने लगे। अपनी बहुत प्रार्थना, विनती, उत्कंठा, भाव और प्रेम होने पर भी द्वारकाधीश कुछ भी नहीं सुनते। उस समय उनके मन में बहुत क्रोध पैदा हुआ और वे बहुत ही विह्वल बन गए। मन में एक ही ध्येय और विचार होने से क्रोध और आवेश में उन्हें अपना भान नहीं रहा। ख़्याल नहीं रहा और 'आप मेरा कुछ क्यों नहीं सुनते...' यह कहकर द्वारकाधीश की मूर्ति के सामने जल भरी झारी का छूटा घाव किया। यह दृश्य वहाँ खड़े पुजारी देख गए और वे घबरा गए। उन्होंने तुरंत ही अजमलजी का हाथ पकड़कर कहा कि, 'आपने यह क्या किया? द्वारकाधीश के साथ ऐसा अविवेक होता है?' उस समय अकुलाहट में ही अकुलाहट में उन्होंने उत्तर दिया, 'ऐसा न करूँ तो क्या करूँ? वे मेरा कुछ सुनते ही नहीं। मैंने कष्ट सहकर कितने ही चक्कर लगाए, फिर भी वे मुझे कोई भी उत्तर नहीं देते...' पुजारी ने इस मनुष्य को यहाँ से दूर करने की युक्ति लगाकर कहा कि, 'असल द्वारका तो समुद्र के भीतर है, वह पूरी सोने की है और वहाँ पानी में द्वारकाधीश विराजमान हैं। तुम वहाँ जाओ तो वहाँ से तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी। यहाँ तो लोगों की जिज्ञासा और इच्छा संतोषने के लिए उनकी मूर्ति पधराई है। इसलिए यदि तुम असल द्वारका देखना चाहते हो और द्वारकाधीश के दर्शन करना चाहते हो तो इस देवल के पीछे के भाग में वह पानी में है, वहाँ जाओ...' ऐसा कहकर पुजारी ने हाथ से निशानी करके वह स्थल बताया। पुजारी की बात सुनकर दूसरा कुछ भी विचारे बिना, एक ही लव और भावावेश में अजमलजी ने उस स्थल की ओर दौड़ लगाई और निर्भयतापूर्वक उस समुद्र में कूद पड़े। पुजारी ने तो ऐसी कल्पना भी नहीं की होगी कि सचमुच ऐसा होगा।
परमात्मा तो सर्वशक्तिमान है। एक पल में वह जो चाहे कर सके, ऐसा सामर्थ्य है। अजमलजी ने जैसे ही पानी में छलाँग लगाई कि तुरंत ही विष्णुरूप द्वारकाधीश को ख़्याल आ गया और एक पल में अपनी मायावी शक्ति से अजमलजी की जिज्ञासा और इच्छा संतोषने के लिए सोने की द्वारका नगरी समुद्र में खड़ी कर दी। सभी प्रकार की सुविधा और सुख-साहिबी खड़ी कर दी। नगरी देखते ही अजमलजी आश्चर्यचकित हो गए। वे भगवान के आलीशान महल में आए और उसमें दाख़िल हुए। दाख़िल होते ही देखा तो द्वारकाधीश रणछोड़राय हिंडोले पर आराम से बैठे थे।
द्वारकाधीश के सन्मुख दर्शन होते ही वे उनके चरणों में नमी पड़े। भावावेश में आँखों में अश्रु आए। द्वारका के नाथ ने उनका हाथ पकड़ा और उठाकर बाहों में लेकर उन्हें अपने हिंडोले की खाट पर बैठाया। स्वयं परमात्मा जब हाथ थामें तब कुछ बाकी रहता है क्या! वह मनुष्य कितना भाग्यशाली कहा जाए!
अब इस समय अजमलराय की दृष्टि प्रभु के ललाट पर गई। उन्होंने देखा तो कपाल पर पट्टी बँधी हुई थी। अजमलजी को आश्चर्य हुआ। उन्होंने पूछा कि, 'हे नाथ! आपके कपाल पर पट्टी! क्या लगा है?' द्वारकाधीश ने मुख मलकाते-मलकाते, मरक-मरक हँसते-हँसते प्रेम से कहा कि, 'मेरे एक भक्त ने अपनी मनोकामना सफल न होने पर अधीर होकर, अकुलाकर मुझे जल भरी झारी फटकारी है। जिससे कपाल में थोड़ा लगा है, इसलिए पट्टी बाँधी है। मैं उस समय मूर्ति में ही था। पर पुजारी ने यहाँ का सूचन किया, इसलिए मुझे उस मंदिर से अपने भक्त की आकांक्षा संतोषने और दर्शन देने यहाँ आना पड़ा...'
तुरंत ही अजमलराय को विचार करते हुए याद आया कि वह झारी तो स्वयं उन्होंने ही फटकारी थी। इससे उन्हें बहुत पश्चाताप हुआ और रोते-रोते क्षमा माँगी। द्वारकाधीश ने अजमलजी को सांत्वना देते हुए और भक्त के प्रेम का महत्त्व बढ़ाते हुए कहा कि, 'चिंता-फ़िक्र न करो, दुःखी न हो। तुम अपना हाथ प्रेम से मेरे कपाल पर फेर दो, इससे मुझे मिट जाएगा...' भगवान तो भक्त के प्रेम के आधीन होते हैं। अजमलजी ने प्रेम से प्रभु के कपाल पर हाथ फेरा। हाथ फिरते ही परमात्मा ने पट्टी छोड़ डाली और देखा तो चोट का कोई चिह्न दिखाई नहीं देता था।
परमात्मा तो सब कुछ जानते थे और जानते ही हैं। पर वे मानव सहज चेष्टा को अपनाते हैं। उन्होंने अजमलजी को यह खात्री करवाने और सत्यता निश्चित करवाने ऐसा नाटक करके पट्टी बाँधी थी।
तत्पश्चात द्वारकाधीश ने उनसे पूछा कि, 'बोलो, किस लिए पधारे हैं?' अजमलजी ने अपनी मनोव्यथा प्रस्तुत करते हुए उत्तर दिया कि, 'हे चौदह लोक के नाथ! मेरे बालक नहीं है। मैं निःसंतान हूँ। मेरी प्रजा के अविवेकी और अपमानजनक शब्द सहन नहीं होते। तो कृपा करके आप मेरा बाँझपन का मेहणा टालो...'
अजमलराय के आजीजी भरे शब्द सुनते ही द्वारकाधीश ने उन्हें धीरज देकर वचन देते हुए कहा कि, 'जाओ, तुम्हारे यहाँ एक वर्ष बाद पुत्र जन्म होगा। उसका नाम तुम वड़ा वीरमदे रखना। बस इतना याद रखना...'
यह बात सुनते ही दिए गए वचन के शब्दों पर उन्हें तुरंत विचार आया। राजा हो तो बुद्धि का पराक्रम भी हो। उन्होंने 'वड़ा वीरमदे' इस शब्द का विचार किया। उन्हें लगा कि यदि वड़ा तो छोटा कौन? उन्होंने अपनी उलझन और शंका दूर करने के लिए तुरंत ही द्वारकाधीश से कहा, 'प्रभु, वड़ा वीरमदे तो छोटा कौन?' इस पर द्वारकाधीश ने दूसरा वचन देते हुए कहा कि, 'जब वड़ा वीरमदे सवा महीने के होंगे तब मैं स्वयं अपनी इच्छा से वहाँ पधारूँगा और पालने में पौढ़ूँगा। उसकी निशानी के रूप में उस कमरे में कुंकुम के कुम-कुम पगलिए पड़ेंगे। यदि कुंकुम पगलिए दिखें तो मानना कि स्वयं द्वारकाधीश ही पधारे हैं। तुम मेरा नाम रामदे रखना...'
अब यहाँ प्रश्न यह है कि एक पुरुष ने अजमलजी को दो वचन क्यों दिए? क्या एक ही पुत्र से बाँझपन का मेहणा न टल सकता? यह बात उनसे कुछ अजानी होगी! और दूसरा यह कि स्वयं सामने चलकर अजमलजी के यहाँ पधारने का दूसरा वचन देकर स्व-इच्छा से अजमलजी के साथ वचन से बँधे हैं। उन्हें अजमलजी ने वचन से बाँधा नहीं है, पर स्वयं बँधे हैं। तो फिर वीरमदे कौन? मानव कक्षा का व्यक्ति इस बात का निर्णय नहीं ले सकता।
इस बात को अकल कला कहा जाए। यह बात बहुत भेदी है और उसके भेद को महापुरुष जानते हैं। वर्ष बीत जाएँ तो भी दूसरे किसी को इसका ख़्याल आ सके ऐसा नहीं है। वाणीरूपी टंकशाली धन भरपूर है, पर मालमी उसे जान सकता है। जब व्यापक शक्ति का अनुसंधान होता है तब ऐसी घटना निर्माण पाती है।
महापुरुष धर्म की मर्यादा रखकर ज्ञान करते हैं। वेदनीति, धर्मनीति, राजनीति और न्यायनीति — इन चारों को बराबर सँभालकर ही बात प्रस्तुत की जाए। उनकी ज्ञान की वार्ता अधिकारी पुरुषों के लिए ही होती है। संतपुरुष वेद की मर्यादा सँभालकर ही बात करते हैं।
अजमलजी को चौदह लोक के नाथ ने पुत्र के रूप में पधारने का वचन दिया। अजमलजी के हृदय में अत्यंत उमाव होता है। आनंदविभोर बन जाते हैं। अब उन्हें विचार आता है कि इस पानी से बाहर कैसे निकलना? द्वारकाधीश ने उनकी मनोदशा को समझकर कहा कि, 'तुमने जिसे झारी फटकारी है उसका ध्यान धरो तो तुम जहाँ से आए हो वहाँ पहुँच जाओगे। जहाँ के तहाँ पहुँच जाओगे...'
द्वारकाधीश के शब्दों को अमल में लाकर उन्होंने द्वारकाधीश की उस मूर्ति का आँखें मींचकर ध्यान धरा। थोड़ी ही देर में उन्होंने देखा तो स्वयं पानी के बाहर किनारे पर बैठे थे। परमात्मा की अजायब शक्ति का उन्हें अनुभव हुआ। उन्होंने जो देखा था वह चित्त में रमता है। वह बात चित्त से अलग नहीं होती। हृदय में आनंद का वातावरण है।
द्वारकाधीश का वचन प्राप्त करके, मंदिर में दर्शन करके वे पोकरणगढ़ आए। उन्होंने मीणलदे से बात करते हुए कहा कि, 'इस बार मुझे स्वयं द्वारकाधीश के दीदार हुए। उन्होंने वचन दिया है कि हमारा बाँझपन का मेहणा भंगेगा। हमारे घर पुत्र जन्म होकर पालना बँधेगा...'
यह बात सुनकर मीणलदे अति हर्ष पाई। इसके बाद उनका समय आनंद-किल्लोल और प्रभुभक्ति में बीतने लगा। वचन के अनुसंधान में मीणलदे को अच्छे दिन दृष्टिगोचर हुए। नगर में भी यह शुभ समाचार फैलते ही लोगों में आनंद बरतने लगा। तत्पश्चात परमात्मा के दिए वचन के अनुसार बराबर एक वर्ष में मीणलदे की पवित्र कूख से पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई। यह मंगल समाचार वायुवेग से पोकरणगढ़ और आसपास के क्षेत्र में फैल गया। प्रजाजनों में अत्यंत उल्लास की लहर फिर गई। नगर में मंगलगीत गाए जाने लगे। लोगों ने राजकुमार का जन्म होते ही उस प्रसंग की राज्य के एक महान उत्सव के रूप में उजवणी की। राजमहल में भी मंगल वर्त रहा है। अजमलजी ने पुत्र जन्म की खुशी में नगर में खारक बाँटी। इस पुत्र का नाम द्वारकाधीश के सुझाव के अनुसार वीरमदे रखा गया।
वीरमदे का जन्म होते ही अजमलराय की काली टीली समान बाँझपन का मेहणा भागा। इसी प्रकार आनंद-किल्लोल में समय बीतने लगा। वीरमदे के जन्म को सवा महीना हुआ तब द्वारकाधीश, चौदह लोक के नाथ, स्वयं परमात्मा अपने वचन के अनुसार बाल स्वरूप में पधारे और वीरमदे के पालने में उनके बगल में आकर पौढ़े। इस समय माता मीणलदे कुछ काम से बाहर गई हुई थीं और राजभोग के लिए चूल्हे पर देग रखी थी।
देग उकलते ही उसमें रहा दूध उभरने लगा। उस समय वहाँ कोई हाज़िर नहीं था। इसलिए पालने में आकर पौढ़े बालस्वरूपी द्वारकाधीश ने अपना हाथ पालने से लंबाकर वह उकलती देग चूल्हे से नीचे उतार दी। इस प्रकार अपने दिव्य आगमन का संकेत और परचा दे दिया। वे जब से पालने में आकर पौढ़े, तब से उनकी आंतरिक शक्ति का प्रकाश, प्रभाव और ताकत फैलने लगे।
थोड़ी देर बाद मीणलदे को अचानक याद आया कि वे चूल्हे पर देग रखकर आई हैं और उतारना भूल गई हैं। इसलिए वे जल्दी-जल्दी उस कमरे में आईं। आते ही उनके आश्चर्य का कोई पार न रहा। उन्होंने उकलती देग चूल्हे से नीचे उतारी हुई देखी। उन्हें बहुत नवाई लगी। उस समय बाल स्वरूपी प्रभु ने वीरमदे को लात मारी, इसलिए वीरमदे रोने लगे। रोते वीरमदे को हिंडोला देने मीणलदे पालने के पास आईं। उन्होंने देखा तो पालने में दो बालक सो रहे हैं। उन्हें बहुत नवाई लगी कि एक में दो कैसे? यह दूसरा बालक कौन? ऐसा विचार करती हैं, तब उन्होंने देखा तो कमरे में कुंकुम के कुम-कुम पगलिए पड़े दिखाई दिए। इससे उनके मन में घबराहट हुई कि यह क्या?
उन्होंने अजमलजी को यह ख़बर पहुँचाने दासियों को भेजा। समाचार सुनते ही अजमलजी वहाँ आए। मीणलदे ने कहा कि, 'इस वीरमदे के पालने में यह तेजस्वी बालक कहाँ से आकर पौढ़ गया? इसके अतिरिक्त पूरे कमरे में कुंकुम के कुम-कुम पगलिए दिखाई देते हैं, तो मुझे इसमें कुछ वहम जाता है और कौतुक रचा हो ऐसा लगता है। इससे घबराहट होती है।'
पालने में दूसरे बालक को देखते ही अजमलराय को द्वारकाधीश के वचन की याद ताज़ी हुई। उनकी आँखें हर्ष से भीगी बनीं। उन्होंने बहुत प्रेम और पूज्यभाव से उस बालक के चरण को चुंबन किया और सर्वप्रथम 'रामदे' ऐसे शब्द का उच्चार करके बुलाया। द्वारकाधीश ने ऐसा नहीं कहा था कि मैं पीर रामदे के रूप में जन्म लूँगा। पर मैं सवा महीने में पालने में आकर पौढ़ूँ तब रामदे नाम रखना, ऐसा कहा था और यह शब्द परंपरा का है।
मीणलदे को इसमें कुछ भी समझ नहीं पड़ी। वे आश्चर्य से यह दृश्य देखती ही रहीं। उन्होंने अजमलजी से कहा कि, 'तुम्हारी यह चेष्टा और बात मैं समझती नहीं। तो जो हकीकत है वह मुझे बताओ...'
अजमलराय ने आज तक अपने हृदय में सँजोकर रखी और याद ताज़ी होते ही वह रहस्य खुला करते हुए बताया कि, 'वीरमदे के बाद सवा महीने में पालने में आकर पौढ़े हैं वे स्वयं द्वारकाधीश ही हैं। वे स्व-इच्छा से आकर पौढ़े हैं। हमारे उत्तम भाग्य हैं कि हमारे घर चौदह लोक के नाथ पधारे हैं। उन्होंने द्वारका में मुझे दर्शन देकर वचन दिया था कि मैं तुम्हारे यहाँ पधारूँगा और तब कुंकुम के कुम-कुम पगलिए पड़ेंगे। ये कुंकुम के कुम-कुम पगलिए उनके दिए निशानी हैं। मैंने यह बात आज तक तुमसे छिपाकर रखी थी। वे हमारा आँगन पावन करने और हमारा जन्म सफल बनाने पधारे हैं। तो अब तुम यह बात किसी को भी न कहना और मर्यादा का पालन करके उन्हें हमारे प्राण समान सँभालना — यह हमारा फ़र्ज़ है।'
ये शब्द सुनते ही मीणलदे अति आनंद पाईं और उनके नेत्रों से प्रेम के आँसू ढल पड़े। उन्होंने उस बालक को लेकर बहुत प्रेम दिखाया और बोलीं कि, 'वाह प्रभु! एक रंक के घर पधारे। हम भले राजवी हैं। फिर भी रंक हैं। क्योंकि हमारे मुखारविंद के दीदार करने यह प्रजा खुश नहीं थी। हमारा कोई शकुन नहीं लेता था। हमारी कोई कीमत नहीं थी। आज हमारे बहुत धन्य भाग्य हैं कि हम रंकों पर रहम करके और पधारकर कृपा की...'
इस समय रामदेवजी महाराज ने वाणी उच्चारी कि, 'अब तुम्हारा काम परिपूर्ण बन गया। जीवन धन्य बन गया। अब तुम्हें परलोक के लिए कोई कार्यवाही करने की ज़रूरत नहीं। क्योंकि हम दोनों बंधु आपके यहाँ पधारे हैं। पूर्व की कोई ग्रंथि से यह संभव बना होगा, जिससे हमें सामने पगले तुम्हारे यहाँ आना पड़ा। तुम्हारे बहुत धन्य भाग्य हैं। अब कुछ भी चिंता-फ़िक्र न करना और मौज करो...'
यह बात भी कितनी सचोट और सत्य है। स्वयं परमात्मा सामने चलकर जिसके घर पधारें उसे कोई फ़िक्र होती है क्या! उसे किसी बात की कुछ कमी होती है क्या! उसे अपने आत्मकल्याण के लिए कुछ करना बाकी रहता है क्या!
पीर रामदेवजी के मुख से उच्चारे शब्द सुनकर अजमलजी ने मीणलदे से कहा कि, "अब मौन रहने की ज़रूरत है। अब तो बस इतना ही मन में रखना कि हमारे यहाँ चौदह लोक के नाथ पुत्ररूप में पधारे हैं और हमारे मन की भीड़ भंगी है..."
भक्त बोडाणाजी ने हाथ में तुलसी बोकर द्वारका के बहुत चक्कर लगाए तब मुश्किल से मेल पड़ा और द्वारका से डाकोर पधारे थे। उसी प्रकार अजमलजी ने भी अपनी मनवांछित इच्छा परिपूर्ण करने के लिए सामान्य मनुष्य की तरह ही द्वारका के फेरे किए, तब चौदह लोक के नाथ पधारे।
इस प्रकार, संतों का और हज़ारों आत्माओं का पुकार सुनकर भैरव का त्रास दूर करने तथा धर्म और संतों की रक्षा के लिए अजमलजी के बाँझपन के मेहणे को निमित्त बनाकर उनके यहाँ पीर रामदेव के रूप में स्वयं पधारे। अजमलराय के लिए बाँझपन के मेहणे की बात ख़राब थी, पर वह मेहणा उन्हें लाभदायी सिद्ध हुआ, आशीर्वादरूप बना। बात ख़राब पर परिणाम उत्तम। मनुष्य के लिए कई बार ख़राब या आपत्तिरूप बात दिखाई देती हो, फिर भी ऐसा भी बन सकता है कि उसके पीछे अच्छा भी छिपा हो।