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पीपली के पीर बाबा रामदेव

श्री रामदेवपीर पीठ — पीपलीधाम

  1. पोकरण गढ़ में प्रागट्य

    भव्य सांस्कृतिक विरासत और परंपरा रखने वाला भारत देश विश्व का अति प्राचीन, पवित्र और महान धर्मप्रधान देश है। वह बहुत विविधता, विपुलता और विशालता रखने वाला, धर्मक्षेत्र में गौरवशाली भूतकाल की भव्य गाथा रखने वाला धन्य देश है। महापुरुषों ने धरती के नौ खंडों में भारत खंड को सबसे कीमती, महान और परम हितकारी कहा है। उसे महामूल्य रत्नों की खान के रूप में सराहा है।

    इस पवित्र भूमि में रत्न समान जैसे और जितने महापुरुष प्रगट हुए हैं, वैसे और उतने महापुरुष अन्यत्र कहीं प्रगट नहीं हुए और समय-समय पर प्रगट होते रहते हैं। इस कायानगरी में भी गगनमंडल की भूमिका को महापुरुष भारतखंड कहते हैं। उस भूमिका में प्रकाशित होकर अनेक महापुरुषों ने विश्व को कल्याणकारी राह दिखाई है और दिखाते रहेंगे।

    इस भारतभूमि में भक्तों को दिए गए कोल-करार के अनुसंधान में धर्म और संतों की रक्षा हेतु सत्वगुणी विष्णु परमात्मा के अवतार हुए हैं और होते रहते हैं। ऐसे ही कोल-करार के अनुसंधान में पीपलीधाम में प्रगट दिव्य बावन गज के देवल में अपने राजसिंहासन पर विराजित प्रगट रणुंजा के राय पीर रामदेवजी महाराज का इस लोक में हुआ आगमन अति दिव्य, अलौकिक और परम कल्याणकारी है।

    पहले से ही विश्व की आध्यात्मिक शक्ति के केंद्र में रहे भारतवर्ष की पश्चिमी धरा पर राजस्थान की भूमि पर मारवाड़ प्रांत स्थित है। पहले वहाँ पोकरणगढ़ का राज्य था। उस पोकरणगढ़ में तुंवर कुल के अजमल राजा राज्य करते थे। इस प्रदेश में भैरव नाम के राक्षस का बहुत त्रास था। उसकी ताकत और शक्ति इतनी थी कि जहाँ वह रहता था, उस क्षेत्र को उसने वीरान कर डाला था। बारह-बारह गाऊ तक उसकी हाँक गूँजती थी। उतने क्षेत्र में मनुष्य, पशु, पक्षी — सभी का वह आहार करता और परिणामस्वरूप उस भूमि पर कोई रहता नहीं, रह सकता नहीं था। साधु-संत भी उसके त्रास और ताप से मुक्त नहीं रहे थे। सभी के लिए वह संकटरूप था। इसलिए इस भूमि को भैरव के भय से मुक्त करवाने हेतु संत हर समय परमात्मा से प्रार्थना करते थे।

    इसके अतिरिक्त उस समय विधर्मी, धर्मांध शासकों द्वारा धर्मांतरण और वटालने की प्रवृत्ति भी पनप रही थी। इसलिए स्व-धर्म को सँभालना, बचाना, टिकाना कठिन था। इस समय हर आत्मा की पुकार थी कि, 'प्रभु, अब आप शीघ्र पधारो, कठिन समय है, तो वातावरण को अनुकूल बनाने तथा धर्म और संतों की रक्षा के लिए आप अवतार धारण करो....'

    प्रजा की पुकार थी। साधु-संतों और सज्जनों की प्रभु को सदा थी। परमात्मा ने धर्म के लिए और संतों की रक्षा के लिए अवतार धारण करने का वचन दिया है। अपने वचन के अनुसार सुपात्र को निमित्त बनाकर, कोई कारण उपस्थित करके, निमित्त का निर्माण करके उनका आगमन होता देखा जाता है। उन्हें आना हो, प्रगट होना हो, तो उस समय का वातावरण और समय-संजोग भी वैसे ही रच जाते हैं।

    पोकरणगढ़ के राजा अजमलजी को कोई संतान नहीं थी। उनकी धर्मपत्नी का नाम मीणलदे था। दोनों बहुत धार्मिक और संस्कारी थे। कहा जाता है कि वे नंद-यशोदा के अवतार थे। भारतीय समाज में विवाह के बाद यदि बहुत समय बीत जाए और बालक न हो तो उसे बाँझ कहते हैं और बाँझ होना मानो समाज का एक प्रकार का अपराध बन जाता है। उसे बाँझपन का मेहणा लग जाता है। लोग उनका शकुन नहीं लेते। लोग यदि शुभ कार्य के लिए प्रयाण कर रहे हों और ऐसे बाँझ लोग सामने मिलें तो उसे अपशकुन मानकर निराश होते हैं और मन में उनके प्रति तिरस्कार की भावना पैदा होती है।

    अजमलराय भी उससे बचे नहीं रह सके। प्रजा में सुगबुगाहट थी। यद्यपि अपना संस्कारी राजा निःसंतान होने का प्रजा को भी दुःख तो लगता था। फिर भी लोगों में असंतोष व्यापक दिखाई देता था। प्रजा कटु वचन भी उच्चारती। उनका कोई शकुन नहीं लेता था। प्रजा के अविवेकी और अपमानजनक शब्द अजमलजी के कानों में पड़े। उनके हृदय को बहुत ठेस पहुँची। मन ही मन बहुत दुःखी हुए। भीतर बहुत हताशा व्याप गई।

    उन्होंने इसका हल और उपाय अपने गुरु महाराज से पूछा। गुरु महाराज ने उन्हें ढाढ़स बँधाकर प्रेम से उपाय बताते हुए कहा कि, 'तुम द्वारकाधीश के दर्शन को जाओ और उन्हें जैसे भी हो रिझाओ; यदि तुम्हारी शुद्ध भावना और भक्ति होगी तो वे रीझेंगे और अवश्य इसका रास्ता सुझाएँगे। द्वारका के नाथ निवाजेंगे तो कार्य सफल बनेगा और तुम्हारा बाँझपन का मेहणा टलेगा। फिर जैसा तुम्हारा विश्वास, जैसी तुम्हारी भावना और जैसा तुम्हारा भाग्य...'

    इस वार्तालाप और मार्गदर्शन के अनुसंधान में अजमलराय ने हर पूनम को द्वारका जाने का निश्चय किया। अब विचार करो कि कहाँ मारवाड़ प्रांत का पोकरणगढ़ और कहाँ द्वारका! उस समय वाहन-व्यवहार की आधुनिक सुविधा के अभाव में उन दोनों के बीच कितना अधिक अंतर कहा जाए! पर अब वह अंतर मिटने वाला होगा, जिससे उन्हें हर पूनम को द्वारका जाने का संकल्प हुआ। हर महीने ऐसा लंबा अंतर तय करना उस ज़माने में कितना कठिन और मुसीबतरूप होगा! आज तो तेज़ वाहन-व्यवहार इतना है कि सुबह जाकर शाम को वापस आ सकें। जबकि उस समय तो दिन निकल जाते थे। फिर भी एक दृढ़ संकल्प था।

    उन्होंने मन ही मन निश्चय किया कि हर पूनम को जाना और यदि बाँझपन का मेहणा न टले तो वहीं प्राणत्याग करना, पर पोकरणगढ़ वापस न आना।

    इस प्रकार हर पूनम को नियम के अनुसार अजमलराय द्वारकाधीश के दर्शन को जाने लगे और उन्हें अपना बाँझपन का मेहणा टालने की आजीजी करने लगे, प्रार्थना करने लगे। हर पूनम को इस तरह जाकर उन्होंने बहुत चक्कर लगाए, पर उसमें उन्हें कोई सफलता दिखाई नहीं देती थी और उनका जो धीरज था, उस धीरज का अंत आ रहा था। उनसे अब अधिक समय यह सहन हो सके ऐसा नहीं था। उनकी सहनशीलता की हद आ गई थी।

    अब उनके भीतर का समय पूर्ण होने आया था। परमात्मा के आगमन का समय अब रच चुका था और उसके फलस्वरूप अजमलजी के हृदय में बहुत बेचैनी व्यापी। उन्होंने आखिर संकल्प किया कि अब इस बार यदि वे मेरी आजीजी न सुनें तो अंत में वहीं प्राणत्याग करना, पर वापस पोकरणगढ़ न जाना।

    इस प्रकार मन ही मन दृढ़ निश्चय करके वे अपना द्वारका का यह अंतिम फेरा मानकर द्वारका जाने निकले। पूनम के दिन वे द्वारकाधीश के मंदिर में आए। द्वारकाधीश के सन्मुख जल की झारी भरकर खड़े रहे और प्रार्थना, स्तुति, वंदना करने लगे। अपनी बहुत प्रार्थना, विनती, उत्कंठा, भाव और प्रेम होने पर भी द्वारकाधीश कुछ भी नहीं सुनते। उस समय उनके मन में बहुत क्रोध पैदा हुआ और वे बहुत ही विह्वल बन गए। मन में एक ही ध्येय और विचार होने से क्रोध और आवेश में उन्हें अपना भान नहीं रहा। ख़्याल नहीं रहा और 'आप मेरा कुछ क्यों नहीं सुनते...' यह कहकर द्वारकाधीश की मूर्ति के सामने जल भरी झारी का छूटा घाव किया। यह दृश्य वहाँ खड़े पुजारी देख गए और वे घबरा गए। उन्होंने तुरंत ही अजमलजी का हाथ पकड़कर कहा कि, 'आपने यह क्या किया? द्वारकाधीश के साथ ऐसा अविवेक होता है?' उस समय अकुलाहट में ही अकुलाहट में उन्होंने उत्तर दिया, 'ऐसा न करूँ तो क्या करूँ? वे मेरा कुछ सुनते ही नहीं। मैंने कष्ट सहकर कितने ही चक्कर लगाए, फिर भी वे मुझे कोई भी उत्तर नहीं देते...' पुजारी ने इस मनुष्य को यहाँ से दूर करने की युक्ति लगाकर कहा कि, 'असल द्वारका तो समुद्र के भीतर है, वह पूरी सोने की है और वहाँ पानी में द्वारकाधीश विराजमान हैं। तुम वहाँ जाओ तो वहाँ से तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी। यहाँ तो लोगों की जिज्ञासा और इच्छा संतोषने के लिए उनकी मूर्ति पधराई है। इसलिए यदि तुम असल द्वारका देखना चाहते हो और द्वारकाधीश के दर्शन करना चाहते हो तो इस देवल के पीछे के भाग में वह पानी में है, वहाँ जाओ...' ऐसा कहकर पुजारी ने हाथ से निशानी करके वह स्थल बताया। पुजारी की बात सुनकर दूसरा कुछ भी विचारे बिना, एक ही लव और भावावेश में अजमलजी ने उस स्थल की ओर दौड़ लगाई और निर्भयतापूर्वक उस समुद्र में कूद पड़े। पुजारी ने तो ऐसी कल्पना भी नहीं की होगी कि सचमुच ऐसा होगा।

    परमात्मा तो सर्वशक्तिमान है। एक पल में वह जो चाहे कर सके, ऐसा सामर्थ्य है। अजमलजी ने जैसे ही पानी में छलाँग लगाई कि तुरंत ही विष्णुरूप द्वारकाधीश को ख़्याल आ गया और एक पल में अपनी मायावी शक्ति से अजमलजी की जिज्ञासा और इच्छा संतोषने के लिए सोने की द्वारका नगरी समुद्र में खड़ी कर दी। सभी प्रकार की सुविधा और सुख-साहिबी खड़ी कर दी। नगरी देखते ही अजमलजी आश्चर्यचकित हो गए। वे भगवान के आलीशान महल में आए और उसमें दाख़िल हुए। दाख़िल होते ही देखा तो द्वारकाधीश रणछोड़राय हिंडोले पर आराम से बैठे थे।

    द्वारकाधीश के सन्मुख दर्शन होते ही वे उनके चरणों में नमी पड़े। भावावेश में आँखों में अश्रु आए। द्वारका के नाथ ने उनका हाथ पकड़ा और उठाकर बाहों में लेकर उन्हें अपने हिंडोले की खाट पर बैठाया। स्वयं परमात्मा जब हाथ थामें तब कुछ बाकी रहता है क्या! वह मनुष्य कितना भाग्यशाली कहा जाए!

    अब इस समय अजमलराय की दृष्टि प्रभु के ललाट पर गई। उन्होंने देखा तो कपाल पर पट्टी बँधी हुई थी। अजमलजी को आश्चर्य हुआ। उन्होंने पूछा कि, 'हे नाथ! आपके कपाल पर पट्टी! क्या लगा है?' द्वारकाधीश ने मुख मलकाते-मलकाते, मरक-मरक हँसते-हँसते प्रेम से कहा कि, 'मेरे एक भक्त ने अपनी मनोकामना सफल न होने पर अधीर होकर, अकुलाकर मुझे जल भरी झारी फटकारी है। जिससे कपाल में थोड़ा लगा है, इसलिए पट्टी बाँधी है। मैं उस समय मूर्ति में ही था। पर पुजारी ने यहाँ का सूचन किया, इसलिए मुझे उस मंदिर से अपने भक्त की आकांक्षा संतोषने और दर्शन देने यहाँ आना पड़ा...'

    तुरंत ही अजमलराय को विचार करते हुए याद आया कि वह झारी तो स्वयं उन्होंने ही फटकारी थी। इससे उन्हें बहुत पश्चाताप हुआ और रोते-रोते क्षमा माँगी। द्वारकाधीश ने अजमलजी को सांत्वना देते हुए और भक्त के प्रेम का महत्त्व बढ़ाते हुए कहा कि, 'चिंता-फ़िक्र न करो, दुःखी न हो। तुम अपना हाथ प्रेम से मेरे कपाल पर फेर दो, इससे मुझे मिट जाएगा...' भगवान तो भक्त के प्रेम के आधीन होते हैं। अजमलजी ने प्रेम से प्रभु के कपाल पर हाथ फेरा। हाथ फिरते ही परमात्मा ने पट्टी छोड़ डाली और देखा तो चोट का कोई चिह्न दिखाई नहीं देता था।

    परमात्मा तो सब कुछ जानते थे और जानते ही हैं। पर वे मानव सहज चेष्टा को अपनाते हैं। उन्होंने अजमलजी को यह खात्री करवाने और सत्यता निश्चित करवाने ऐसा नाटक करके पट्टी बाँधी थी।

    तत्पश्चात द्वारकाधीश ने उनसे पूछा कि, 'बोलो, किस लिए पधारे हैं?' अजमलजी ने अपनी मनोव्यथा प्रस्तुत करते हुए उत्तर दिया कि, 'हे चौदह लोक के नाथ! मेरे बालक नहीं है। मैं निःसंतान हूँ। मेरी प्रजा के अविवेकी और अपमानजनक शब्द सहन नहीं होते। तो कृपा करके आप मेरा बाँझपन का मेहणा टालो...'

    अजमलराय के आजीजी भरे शब्द सुनते ही द्वारकाधीश ने उन्हें धीरज देकर वचन देते हुए कहा कि, 'जाओ, तुम्हारे यहाँ एक वर्ष बाद पुत्र जन्म होगा। उसका नाम तुम वड़ा वीरमदे रखना। बस इतना याद रखना...'

    यह बात सुनते ही दिए गए वचन के शब्दों पर उन्हें तुरंत विचार आया। राजा हो तो बुद्धि का पराक्रम भी हो। उन्होंने 'वड़ा वीरमदे' इस शब्द का विचार किया। उन्हें लगा कि यदि वड़ा तो छोटा कौन? उन्होंने अपनी उलझन और शंका दूर करने के लिए तुरंत ही द्वारकाधीश से कहा, 'प्रभु, वड़ा वीरमदे तो छोटा कौन?' इस पर द्वारकाधीश ने दूसरा वचन देते हुए कहा कि, 'जब वड़ा वीरमदे सवा महीने के होंगे तब मैं स्वयं अपनी इच्छा से वहाँ पधारूँगा और पालने में पौढ़ूँगा। उसकी निशानी के रूप में उस कमरे में कुंकुम के कुम-कुम पगलिए पड़ेंगे। यदि कुंकुम पगलिए दिखें तो मानना कि स्वयं द्वारकाधीश ही पधारे हैं। तुम मेरा नाम रामदे रखना...'

    अब यहाँ प्रश्न यह है कि एक पुरुष ने अजमलजी को दो वचन क्यों दिए? क्या एक ही पुत्र से बाँझपन का मेहणा न टल सकता? यह बात उनसे कुछ अजानी होगी! और दूसरा यह कि स्वयं सामने चलकर अजमलजी के यहाँ पधारने का दूसरा वचन देकर स्व-इच्छा से अजमलजी के साथ वचन से बँधे हैं। उन्हें अजमलजी ने वचन से बाँधा नहीं है, पर स्वयं बँधे हैं। तो फिर वीरमदे कौन? मानव कक्षा का व्यक्ति इस बात का निर्णय नहीं ले सकता।

    इस बात को अकल कला कहा जाए। यह बात बहुत भेदी है और उसके भेद को महापुरुष जानते हैं। वर्ष बीत जाएँ तो भी दूसरे किसी को इसका ख़्याल आ सके ऐसा नहीं है। वाणीरूपी टंकशाली धन भरपूर है, पर मालमी उसे जान सकता है। जब व्यापक शक्ति का अनुसंधान होता है तब ऐसी घटना निर्माण पाती है।

    महापुरुष धर्म की मर्यादा रखकर ज्ञान करते हैं। वेदनीति, धर्मनीति, राजनीति और न्यायनीति — इन चारों को बराबर सँभालकर ही बात प्रस्तुत की जाए। उनकी ज्ञान की वार्ता अधिकारी पुरुषों के लिए ही होती है। संतपुरुष वेद की मर्यादा सँभालकर ही बात करते हैं।

    अजमलजी को चौदह लोक के नाथ ने पुत्र के रूप में पधारने का वचन दिया। अजमलजी के हृदय में अत्यंत उमाव होता है। आनंदविभोर बन जाते हैं। अब उन्हें विचार आता है कि इस पानी से बाहर कैसे निकलना? द्वारकाधीश ने उनकी मनोदशा को समझकर कहा कि, 'तुमने जिसे झारी फटकारी है उसका ध्यान धरो तो तुम जहाँ से आए हो वहाँ पहुँच जाओगे। जहाँ के तहाँ पहुँच जाओगे...'

    द्वारकाधीश के शब्दों को अमल में लाकर उन्होंने द्वारकाधीश की उस मूर्ति का आँखें मींचकर ध्यान धरा। थोड़ी ही देर में उन्होंने देखा तो स्वयं पानी के बाहर किनारे पर बैठे थे। परमात्मा की अजायब शक्ति का उन्हें अनुभव हुआ। उन्होंने जो देखा था वह चित्त में रमता है। वह बात चित्त से अलग नहीं होती। हृदय में आनंद का वातावरण है।

    द्वारकाधीश का वचन प्राप्त करके, मंदिर में दर्शन करके वे पोकरणगढ़ आए। उन्होंने मीणलदे से बात करते हुए कहा कि, 'इस बार मुझे स्वयं द्वारकाधीश के दीदार हुए। उन्होंने वचन दिया है कि हमारा बाँझपन का मेहणा भंगेगा। हमारे घर पुत्र जन्म होकर पालना बँधेगा...'

    यह बात सुनकर मीणलदे अति हर्ष पाई। इसके बाद उनका समय आनंद-किल्लोल और प्रभुभक्ति में बीतने लगा। वचन के अनुसंधान में मीणलदे को अच्छे दिन दृष्टिगोचर हुए। नगर में भी यह शुभ समाचार फैलते ही लोगों में आनंद बरतने लगा। तत्पश्चात परमात्मा के दिए वचन के अनुसार बराबर एक वर्ष में मीणलदे की पवित्र कूख से पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई। यह मंगल समाचार वायुवेग से पोकरणगढ़ और आसपास के क्षेत्र में फैल गया। प्रजाजनों में अत्यंत उल्लास की लहर फिर गई। नगर में मंगलगीत गाए जाने लगे। लोगों ने राजकुमार का जन्म होते ही उस प्रसंग की राज्य के एक महान उत्सव के रूप में उजवणी की। राजमहल में भी मंगल वर्त रहा है। अजमलजी ने पुत्र जन्म की खुशी में नगर में खारक बाँटी। इस पुत्र का नाम द्वारकाधीश के सुझाव के अनुसार वीरमदे रखा गया।

    वीरमदे का जन्म होते ही अजमलराय की काली टीली समान बाँझपन का मेहणा भागा। इसी प्रकार आनंद-किल्लोल में समय बीतने लगा। वीरमदे के जन्म को सवा महीना हुआ तब द्वारकाधीश, चौदह लोक के नाथ, स्वयं परमात्मा अपने वचन के अनुसार बाल स्वरूप में पधारे और वीरमदे के पालने में उनके बगल में आकर पौढ़े। इस समय माता मीणलदे कुछ काम से बाहर गई हुई थीं और राजभोग के लिए चूल्हे पर देग रखी थी।

    देग उकलते ही उसमें रहा दूध उभरने लगा। उस समय वहाँ कोई हाज़िर नहीं था। इसलिए पालने में आकर पौढ़े बालस्वरूपी द्वारकाधीश ने अपना हाथ पालने से लंबाकर वह उकलती देग चूल्हे से नीचे उतार दी। इस प्रकार अपने दिव्य आगमन का संकेत और परचा दे दिया। वे जब से पालने में आकर पौढ़े, तब से उनकी आंतरिक शक्ति का प्रकाश, प्रभाव और ताकत फैलने लगे।

    थोड़ी देर बाद मीणलदे को अचानक याद आया कि वे चूल्हे पर देग रखकर आई हैं और उतारना भूल गई हैं। इसलिए वे जल्दी-जल्दी उस कमरे में आईं। आते ही उनके आश्चर्य का कोई पार न रहा। उन्होंने उकलती देग चूल्हे से नीचे उतारी हुई देखी। उन्हें बहुत नवाई लगी। उस समय बाल स्वरूपी प्रभु ने वीरमदे को लात मारी, इसलिए वीरमदे रोने लगे। रोते वीरमदे को हिंडोला देने मीणलदे पालने के पास आईं। उन्होंने देखा तो पालने में दो बालक सो रहे हैं। उन्हें बहुत नवाई लगी कि एक में दो कैसे? यह दूसरा बालक कौन? ऐसा विचार करती हैं, तब उन्होंने देखा तो कमरे में कुंकुम के कुम-कुम पगलिए पड़े दिखाई दिए। इससे उनके मन में घबराहट हुई कि यह क्या?

    उन्होंने अजमलजी को यह ख़बर पहुँचाने दासियों को भेजा। समाचार सुनते ही अजमलजी वहाँ आए। मीणलदे ने कहा कि, 'इस वीरमदे के पालने में यह तेजस्वी बालक कहाँ से आकर पौढ़ गया? इसके अतिरिक्त पूरे कमरे में कुंकुम के कुम-कुम पगलिए दिखाई देते हैं, तो मुझे इसमें कुछ वहम जाता है और कौतुक रचा हो ऐसा लगता है। इससे घबराहट होती है।'

    पालने में दूसरे बालक को देखते ही अजमलराय को द्वारकाधीश के वचन की याद ताज़ी हुई। उनकी आँखें हर्ष से भीगी बनीं। उन्होंने बहुत प्रेम और पूज्यभाव से उस बालक के चरण को चुंबन किया और सर्वप्रथम 'रामदे' ऐसे शब्द का उच्चार करके बुलाया। द्वारकाधीश ने ऐसा नहीं कहा था कि मैं पीर रामदे के रूप में जन्म लूँगा। पर मैं सवा महीने में पालने में आकर पौढ़ूँ तब रामदे नाम रखना, ऐसा कहा था और यह शब्द परंपरा का है।

    मीणलदे को इसमें कुछ भी समझ नहीं पड़ी। वे आश्चर्य से यह दृश्य देखती ही रहीं। उन्होंने अजमलजी से कहा कि, 'तुम्हारी यह चेष्टा और बात मैं समझती नहीं। तो जो हकीकत है वह मुझे बताओ...'

    अजमलराय ने आज तक अपने हृदय में सँजोकर रखी और याद ताज़ी होते ही वह रहस्य खुला करते हुए बताया कि, 'वीरमदे के बाद सवा महीने में पालने में आकर पौढ़े हैं वे स्वयं द्वारकाधीश ही हैं। वे स्व-इच्छा से आकर पौढ़े हैं। हमारे उत्तम भाग्य हैं कि हमारे घर चौदह लोक के नाथ पधारे हैं। उन्होंने द्वारका में मुझे दर्शन देकर वचन दिया था कि मैं तुम्हारे यहाँ पधारूँगा और तब कुंकुम के कुम-कुम पगलिए पड़ेंगे। ये कुंकुम के कुम-कुम पगलिए उनके दिए निशानी हैं। मैंने यह बात आज तक तुमसे छिपाकर रखी थी। वे हमारा आँगन पावन करने और हमारा जन्म सफल बनाने पधारे हैं। तो अब तुम यह बात किसी को भी न कहना और मर्यादा का पालन करके उन्हें हमारे प्राण समान सँभालना — यह हमारा फ़र्ज़ है।'

    ये शब्द सुनते ही मीणलदे अति आनंद पाईं और उनके नेत्रों से प्रेम के आँसू ढल पड़े। उन्होंने उस बालक को लेकर बहुत प्रेम दिखाया और बोलीं कि, 'वाह प्रभु! एक रंक के घर पधारे। हम भले राजवी हैं। फिर भी रंक हैं। क्योंकि हमारे मुखारविंद के दीदार करने यह प्रजा खुश नहीं थी। हमारा कोई शकुन नहीं लेता था। हमारी कोई कीमत नहीं थी। आज हमारे बहुत धन्य भाग्य हैं कि हम रंकों पर रहम करके और पधारकर कृपा की...'

    इस समय रामदेवजी महाराज ने वाणी उच्चारी कि, 'अब तुम्हारा काम परिपूर्ण बन गया। जीवन धन्य बन गया। अब तुम्हें परलोक के लिए कोई कार्यवाही करने की ज़रूरत नहीं। क्योंकि हम दोनों बंधु आपके यहाँ पधारे हैं। पूर्व की कोई ग्रंथि से यह संभव बना होगा, जिससे हमें सामने पगले तुम्हारे यहाँ आना पड़ा। तुम्हारे बहुत धन्य भाग्य हैं। अब कुछ भी चिंता-फ़िक्र न करना और मौज करो...'

    यह बात भी कितनी सचोट और सत्य है। स्वयं परमात्मा सामने चलकर जिसके घर पधारें उसे कोई फ़िक्र होती है क्या! उसे किसी बात की कुछ कमी होती है क्या! उसे अपने आत्मकल्याण के लिए कुछ करना बाकी रहता है क्या!

    पीर रामदेवजी के मुख से उच्चारे शब्द सुनकर अजमलजी ने मीणलदे से कहा कि, "अब मौन रहने की ज़रूरत है। अब तो बस इतना ही मन में रखना कि हमारे यहाँ चौदह लोक के नाथ पुत्ररूप में पधारे हैं और हमारे मन की भीड़ भंगी है..."

    भक्त बोडाणाजी ने हाथ में तुलसी बोकर द्वारका के बहुत चक्कर लगाए तब मुश्किल से मेल पड़ा और द्वारका से डाकोर पधारे थे। उसी प्रकार अजमलजी ने भी अपनी मनवांछित इच्छा परिपूर्ण करने के लिए सामान्य मनुष्य की तरह ही द्वारका के फेरे किए, तब चौदह लोक के नाथ पधारे।

    इस प्रकार, संतों का और हज़ारों आत्माओं का पुकार सुनकर भैरव का त्रास दूर करने तथा धर्म और संतों की रक्षा के लिए अजमलजी के बाँझपन के मेहणे को निमित्त बनाकर उनके यहाँ पीर रामदेव के रूप में स्वयं पधारे। अजमलराय के लिए बाँझपन के मेहणे की बात ख़राब थी, पर वह मेहणा उन्हें लाभदायी सिद्ध हुआ, आशीर्वादरूप बना। बात ख़राब पर परिणाम उत्तम। मनुष्य के लिए कई बार ख़राब या आपत्तिरूप बात दिखाई देती हो, फिर भी ऐसा भी बन सकता है कि उसके पीछे अच्छा भी छिपा हो।

  2. भैरव को भोंयरे में भंडारा

    रणुंजा के राय पीर रामदेवजी महाराज ने अपने जीवनकाल में, अपने अवतारी कार्य में बहुत परचे दिए हैं और पीराणे का परिभाव दिया है। उन्होंने प्रगट होते ही उकलती देग उतारकर परचे के परिभाव की शुरुआत कर दी थी। पर बाद में समझकर अपनी माया शक्ति से माता-पिता के हृदय में अपनी दिव्यता को भुलाकर, सबको होती है वैसी पुत्रप्रेम की भावना पैदा कर दी थी।

    पीर रामदेवजी भैरव राक्षस का त्रास दूर करने और उसे संहारने पधारे थे। यह भैरव राक्षस बावा बालनाथ का शिष्य था। उसने बारह-बारह गाऊ तक की ज़मीन उजाड़ कर डाली थी।

    अब भैरव राक्षस का समय समाप्त होने की घड़ी आ गई। एक बार रामदेवजी और वीरमदेवजी शाम के समय गेड़ी-दड़ा खेलने निकले। बाल साथी मित्रों की टोली बनाकर उन्होंने गेड़ी-दड़े का खेल शुरू किया। इसके साथ ही भैरव के संहार के लिए का खेल भी शुरू हो चुका। खेल में ऐसी शर्त रखी थी कि जिस किसी के हाथ से दड़ा भैरव की हद में जाए तो वह दड़ा उसे जाकर ले आना होगा। खेलते-खेलते रामदेवजी ने हेतुपूर्वक दड़े को बहुत दौड़ाया और ऐसे ज़ोर से गेड़ी मारी कि दड़ा भैरव की हद में गया। बावा बालनाथ वहाँ रहते थे। उनकी कुटिया के निकट भैरव का रहठाण था। दड़ा वहाँ गया। अब क्या करना? रामदेवजी ने कहा कि, 'तुम सब खड़े रहो, मैं दड़ा लेकर वापस आता हूँ..' सबने भैरव के डर के कारण मना किया। पर यह तो पीर रामदेव। रामदेवजी ने किसी का नहीं माना और भैरव की हद में दौड़ लगाई। उन्हें डर तो था ही नहीं। उन्हें तो ख़बर ही थी। आज वे अपनी कार्यवाही सफल बनाने आए थे।

    पीर रामदेव बावा बालनाथ की कुटिया पर आए। बावा बालनाथ देर शाम के समय इस बालक को यहाँ देखकर घबराए। उन्होंने कहा, 'हे बालक, तू कौन है? यहाँ किस लिए आया है? तुझे ख़बर नहीं कि यहाँ अभी भैरव राक्षस आएगा तो तुझे मार डालेगा?' किशोर रामदेवजी ने उत्तर दिया कि, 'आप तो महापुरुष हैं। हम गेड़ी-दड़ा खेल रहे थे और भूल से मेरे हाथ से वह दड़ा यहाँ आया है। हमारी शर्त के अनुसार वह दड़ा मुझे लाकर देना है। इसलिए मैं दड़ा खोजने आया हूँ। आप जैसे महापुरुष के शरण में हूँ, फिर मुझे क्या डर हो।' बावा बालनाथ तो यह सुनते ही रह गए। उन्हें यह बालक कोई असाधारण हो ऐसा लगा। इतने में भैरव के आगमन के चिह्न दिखाई दिए। वातावरण में कोलाहल मच गया। बावा बालनाथ ने भैरव से बचाने के लिए रामदेवजी को अपनी कुटिया में एक कोने में सुलाकर ऊपर कंथा (गोदड़ी) ओढ़ा दी और सिर पर हाथ रखकर 'रामराम' ऐसा उच्चार किया। इस प्रकार बावा बालनाथ ने शीश पर हाथ रखते ही वे रामदेवजी के गुरु हुए। इस तरह स्वयं होते हुए भी गुरु परंपरा धारण करके गुरुपद की महिमा बढ़ाई।

    सत्य सनातन धर्म में प्रथम से ही गुरु का सबसे विशेष महत्व है। गुरु परंपरा सत्य सनातन धर्म का मुख्य आधार है। राम, कृष्ण, जनक, शुकदेवजी, नारद वगैरह ने भी उस परंपरा के अनुसार सद्‌गुरु धारण किए थे। क्योंकि जितना भी ज्ञान हो, पर आत्मज्ञान या निजस्वरूप के ज्ञान के लिए सद्‌गुरु धारण करना अति आवश्यक है। गुरु के बिना वह ज्ञान मिल नहीं सकता।

    उसके बाद भैरव आया। उसे मनुष्य की गंध आने लगी और अपने गुरु बावा बालनाथ से कहा कि, 'यहाँ कोई मनुष्य हो ऐसा दिखता है, तो मुझे कहो कि वह कहाँ है?' ऐसा कहकर वह सब जगह तलाश करने लगा। ऐसा करते हुए उसे कुटिया के कोने में वहम पड़ा तो उसने उस कंथा को हटाने के लिए खींचना शुरू किया। पर यह क्या? वह कंथा तो जैसे-जैसे खिंचती गई, वैसे-वैसे लंबी होती गई। भैरव थक गया। आख़िर में रामदेवजी ने कंथा हटा दी और भैरव के सामने लड़ाई आदरी।

    भैरव का समय अब पूरा हो गया था। उसने गुरुवचन का भंग करके धूणे की मर्यादा तोड़ी थी। भैरव को मौत नज़र आई। वह समझ गया कि यह कोई सामान्य बालक नहीं है और आज उसके उद्धार का समय है, यह उसने पारख लिया।

    पीर रामदेवजी को भैरव ने दो हाथ जोड़कर कहा कि, 'मुझे मारो नहीं, आप बावा बालनाथ के शिष्य हैं और मैं भी उनका ही शिष्य हूँ। तो हम गुरु-भाई हुए। अब से मैं किसी को त्रास नहीं दूँगा और आप मुझ पर ऐसी दया करो कि जिससे आपके साथोसाथ मेरा नाम भी अमर रहे और मेरा उद्धार हो...' भैरव की हृदयपूर्वक आजीजी सुनकर श्री रामदेवपीर ने उसे वचन से बाँधकर युक्ति द्वारा भोंयरे में भंडार दिया। उसे मार नहीं डाला, पर भोंयरे में भंडारकर पत्थर की शिला आड़ी रख दी और रणुंजा में भादरवा सुद-११ के बाद जो कोई रहे उसमें से एक-दो को अपने खाद्य के रूप में संहार करने की छूट दी। भादरवा सुद-११ का जो प्रसाद धराया जाएगा वह भैरव को प्राप्त होगा।

    इस प्रकार श्री रामदेवजी महाराज ने भैरव को भोंयरे में भंडारकर उस प्रदेश से ज़ुल्म, त्रास और भय का साम्राज्य दूर किया और शांति, सलामती तथा निर्भयता का वातावरण खड़ा किया। भैरव को भंडारकर रामदेवजी पोकरण आए। लोग यह बात सुनते ही अत्यंत पुलकित बने और उनका जय-जयकार किया। इस घटना से लोगों को यह पुरुष कोई असाधारण पुरुष है, ऐसा निश्चित होने लगा। उन्होंने अपना मुख्य अवतारी कार्य सफल बनाकर अब पीराई के परचों द्वारा धर्म की रक्षा की और उसके अनुरूप वातावरण खड़ा करने की कार्यवाही आरंभी।

  3. अब तुम हिंदवा पीर सच्चा

    धीरे-धीरे श्री रामदेवपीर के परचे और पीराई की बातें फैलने लगीं। श्री रामदेवपीर पीर हैं और पीराई का प्रमाण दे रहे हैं, ऐसी लोगों में चर्चा होने लगी। अधिकाधिक लोग उनका अनुसरण करने लगे। उनकी ओर खिंचाव होने लगा। पूज्यभाव प्रगटने लगा और उन्हें मानने लगे। उस समय भारत में दिल्ली में मुस्लिम शासन था। मुहम्मद पयगंबर साहब की मूल पवित्र भावना को भूलकर (मानवधर्म) भाईचारे तथा समानता के सिद्धांतों और भावनाओं को भूलकर धर्मांध बादशाहों ने धर्म-ज़नून से प्रेरित होकर अपने धर्म के फैलाव के लिए दुनिया के विविध प्रदेशों में ज़ोर, ज़ुल्म और त्रास का भी सहारा लिया था, ऐसा उस समय का इतिहास कहता है।

    भारत में भी ऐसा कठिन काल था। ऐसे समय में श्री रामदेवपीर की पीराई से बहुत मुस्लिम बिरादर भी आकर्षित हुए। उन्हें भी लगा कि श्री रामदेवपीर कोई महान पुरुष हैं। इस्लाम धर्म में भी बहुत पीर, फ़कीर, औलिया — बहुत पवित्रता वाले, ख़ुदा की बंदगी में रत और गुणों के भंडार होते हैं। उनमें वैर-ज़ेर, ईर्ष्या या धर्मांधता नहीं होती, पर ऐसे हर कोई नहीं होते। ईर्ष्यालुओं का भी टोटा नहीं है।

    ऐसा हर समाज में देखने को मिलता है। मुस्लिमों में बहुत ऐसे फ़कीर-औलिया थे कि जिन्हें ईर्ष्यालुओं की बात पसंद नहीं थी। पर इस्लाम धर्मियों का उन पर दबाव हुआ कि ऐसे ही चलेगा तो अधिकांश मुस्लिम उनके अनुयायी बन जाएँगे और पीर तो मुसलमान में ही हो, हिंदू में न हो। उस समय इस्लाम के पीर-पयगंबरों के पास ताकत भी थी, शक्ति थी, पीर के रूप में पूजे जाते थे। इस्लाम के सिवा पीर हो नहीं सकता, इतनी पीराई इस्लाम धर्म में उद्‌भवी थी और उन्होंने प्रकाश डाला था।

    इसलिए इस्लाम धर्म के अनुयायियों के दबाव और आग्रह के कारण भारत के इस्लाम धर्म के वड़ों ने अपने मुख्य मथक मक्का-मदीना में जाकर वहाँ पीरों के पीर, बादशाहों के बादशाह ऐसे मुसापीर से यह बात कही और कहा कि, 'आप उनकी पीराई की कसौटी करो, वह सत्य है या असत्य, यह निश्चित करो। यह सब उन्होंने ढोंग रचा है और आप पधारकर वह ढोंग खुला करके उनकी पीराई को छिन्न-भिन्न कर डालो। यदि ऐसा नहीं किया जाएगा तो हमारे इस्लाम धर्म को बहुत ठेस पहुँचेगी। तो आप पधारो और ख़ात्री करो...'

    यह बात सुनकर मुसापीर और अन्य पीर विचार में पड़ गए। उन्हें लगा कि पीर तो मुसलमान में ही हो, दूसरे किसी में पीर हो नहीं। दूसरे में पीराई हो ही नहीं। हिंदू में आज तक कोई पीर पका नहीं। तो यह फिर पीर कौन? यदि सचमुच ऐसा ही हो तो उनकी पीराई अवश्य देखनी चाहिए और यदि वह पीराई न बताएँ, पीराई का अनुभव न करवाएँ तो उनकी पीराई को छिन्न-भिन्न कर डालनी।

    ऐसा निर्णय करके मक्का के मुसापीर सहित पाँच पीर रणुंजा (पोकरणगढ़) आने निकले। वे रणुंजा के सीमाड़े आ पहुँचे। उस समय रामदेवजी और उनका मित्र सवारथिया वहाँ बैठे थे। और रामदेवजी का घोड़ा वहाँ बगल में चर रहा था। पाँचों पीर उनके पास आए और पूछा कि, 'रणुंजा यहाँ से कितना दूर है?' रामदेवजी ने उत्तर दिया कि, 'यह सामने दिखाई देता है वही रणुंजा है..' उत्तर सुनकर मुसापीर ने पूछा कि, 'वहाँ कोई रामदेवपीर हैं?' प्रश्न सुनकर सवारथिया ने कहा कि, 'ये खड़े हैं वही रामदेवपीर हैं।'

    पाँचों पीरों को रामदेवजी को देखकर नवाई लगी। उनके बाह्य दिखावे या परिवर्तन में उन्हें कुछ भी नवीनता न लगी। इससे एक पीर ने पूछा कि, 'क्या तुम ही सचमुच रामदेवपीर हो? तुमने परचे पूरे किए हैं?' श्री रामदेवपीर ने उत्तर दिया कि, 'हाँ, लोग मुझे रामदेवपीर कहते हैं..' मुसापीर ने कहा कि 'अब हम बैठकर बातें करें..' रामदेवपीर कहते हैं, 'भले, आप तो हमारे मेहमान हैं...'

    उस समय पाँच पीरों ने दातुन करके वहाँ डाले। उस दातुन से रामदेवपीर ने अपनी कला वापरकर पाँच पीपली उगाईं और पीपली की छाँव में उन्हें बैठाने के लिए अपने घोड़े पर सवा हाथ की जाजम थी, वह बिछाई। यह देखकर पीर हँसे और कहने लगे कि, 'देखो न, ऐसे कुछ पीर बन जाया जाता है। यह तो ढोंग करके लोगों को फँसाकर हिंदूपीर के रूप में नाम बाहर पड़ा है। इसमें कहाँ कुछ विवेक या गम है। इसमें ताकत, पराक्रम, बुद्धि, आवड़त या पीराई हो ऐसा कुछ दिखाई ही नहीं देता...' श्री रामदेवपीर ने उन्हें बैठने का आग्रह किया। पीरों ने कहा कि, 'हम इतनी सी जाजम में कहाँ बैठें?' श्री रामदेवपीर ने कहा, 'आप बैठो तो ज़रा...'

    इससे सबसे पहले मुसापीर ने आसन ग्रहण किया। वे जैसे आसन पर विराजमान हुए कि तुरंत ही वह जाजम सवा हाथ बढ़ी। दूसरे पीर बैठे। फिर जाजम सवा हाथ लंबी हुई। इस प्रकार जाजम सवा हाथ लंबी होती गई और पाँचों पीरों के आसन पर बैठने पर भी सवा हाथ जाजम बची — पाँचों पीरों को बहुत नवाई लगी। पाँचों पीरों ने विचारा कि, सवा हाथ की जाजम में हमें परिपूर्ण आसन तो दिया। ऐसी जोगवाई तो देखने को मिली। पर अब इससे विशेष क्या? उसकी तलाश करें। इससे मुसापीर ने कहा कि, 'हमें तो आप पीर हों ऐसा दिखाई देता है, पर जो बावन हज़ार औलिया मक्का-मदीना में निवास कर रहे हैं उन सबके ब्रह्मांड में, उनके गगनमंडल में जो नाद गरज रहा है, वह कैसे बाद हो? आप हिंदवा पीर हैं ऐसा उन्हें कैसे साबित हो! तो हमें आपकी अधिक शक्ति देखनी है...'

    श्री रामदेवपीर ने कहा कि, 'भले, जैसी इच्छा; आपके भाग्य में जो होगा वह आपको देखने मिलेगा। आप उन बावन हज़ार औलिया को बुला लो।'

    यह सुनकर पाँचों पीरों ने आकाशमार्ग से ५२००० औलिया को बुलाया। ये बावन हज़ार औलिया यहाँ आए, उससे पहले उनके लिए तमाम सुविधा अनायास खड़ी हो गई। यह सुविधा देखकर हर एक के मन का गर्व गल गया। तत्पश्चात सब औलिया से पूछा कि 'बोलो, अब आपकी क्या इच्छा है?' औलियाओं ने कहा कि, 'बस दूसरा कुछ नहीं, एक ही इच्छा — भोजन। हमारी मनोकामना पूर्ण हो और हमारी इच्छा के अनुसार भोजन करवाओ तो हम मानें कि हिंदवा पीर सच्चा...'

    फिर श्री रामदेवजी महाराज ने एक छोटी देग में सवा पाँच सेर दूध, सवा सेर चावल और सवा पावसेर शक्कर डालकर उसकी देग बनाई। यह देखकर पीर ने पूछा कि, 'आप यह क्या बना रहे हैं?' श्री रामदेवजी महाराज ने उत्तर दिया कि, 'यह तो बावन हज़ार औलिया और आपके लिए हर प्रकार की रसोई बन रही है। जिसकी जैसी इच्छा हो, वैसी सब प्रकार की रसोई इसमें बनती है और बन जाएगी...'

    इससे सब पीरों ने विचारा कि कदाचित वे कुछ ऐसा कर सकें तो हम उनसे पहले विचारें, नहीं तो हमारी पीराई को झाँखप लगे। तो सबने ऐसा कहा कि 'यदि तुम हिंदवा पीर हो और हमें भोजन करवाना हो तो हम अपने ठाम में जीमते हैं। दूसरे पात्र में जीमते नहीं। हमारे ठाम मक्का-मदीना में पड़े हैं। यदि तुम वे लाकर दो तो उसमें हम भोजन करें...'

    इससे श्री रामदेवजी महाराज ने कहा कि, 'भले, इसमें क्या; पर फिर तो आप खुश ही न...! वे तो आ जाएँगे...' फिर कौन जाने श्री रामदेवजी महाराज ने ऐसी क्या करामत वापरी कि वहाँ से सबके पात्र इकट्ठे करके आकाशमार्ग से लाकर ढेर किया और कहा कि, 'अब आप अपने ठाम खोज लो। ध्यान रखना कि पात्र बदलना न चाहिए। यदि पात्र बदल जाएगा तो तुम अपनी पीराई हार जाओगे। तुम्हारी पीराई को झाँखप लगेगी। तुम्हारे पात्र या ठाम की तुम्हें ख़बर न रहे तो वह विचारने जैसा मुद्दा बन जाएगा...'

    इससे सभी पीर और औलियाओं ने बहुत ही चौकसी और ध्यानपूर्वक जाँचकर अपने-अपने पात्र अपने हाथ में ले लिए। फिर भी कुछ के ठाम आड़े-अवले हो गए, पर महापुरुषों ने मरम से वह सब सँभाल रखा। तत्पश्चात पाँच पीर और बावन हज़ार औलिया को भोजन करने बैठाया। जिसे जो-जो इच्छा हुई वह जीभ से उच्चारने लगा। एक ही वस्तु परोसनी और प्रियता वाली वस्तु माँगनी। इस प्रकार हर एक को मनचाही वानगी एक ही वस्तु परोसकर पात्र में दी और फिर पूछा कि, 'कैसे, अब बराबर?' सबने बहुत नवाई के साथ हाँ भरी। फिर कहा कि, 'अब भोजन पा लो...'

    औलिया भोजन कर रहे, उसके बाद फिर विचारा कि लाओ, अब देखें कि इनके पीछे अभी कैसी पीराई है। ऐसा विचारकर उन्होंने शब्द उच्चारे कि 'पीरजी, हम को फिर भोजन पाने की इच्छा हुई है...' इससे श्री रामदेवजी महाराज ने कहा कि, 'तो इसमें क्या? आप को भोजन पाने की इच्छा हुई हो तो आप फिर से लगाओ...'

    फिर दोबारा प्रसाद बाँटने की शुरुआत की। यह देखकर पाँचों पीर खड़े होकर दोनों हाथ जोड़कर चुंगी भरी और सलाम भरकर मस्तक नमाकर कहा कि, 'आज तक हम ऐसा मान रहे थे कि हमारे मुसलमान के सिवा दूसरे कहीं पीर नहीं और हो भी न सके। पर अब हम सबको आपकी पीराई का परिपूर्ण परिभाव देखने और अनुभव करने मिला। आपके विषय में जो कुछ हकीकतें हमने सुनी थीं वे संपूर्ण सत्य हैं, इसकी हमें ख़ात्री हो गई है। अब हमें निश्चित हो गया है कि आप में संपूर्ण पीराई है। अब तुम हिंदवा पीर सच्चा।'

    इस प्रकार मक्का के पाँच पीर और बावन हज़ार औलिया रणुंजा के राय पीर रामदेवजी महाराज से अत्यंत प्रसन्न होकर, अपने को धन्य मानकर उन्हें 'हिंदवा पीर' का इल्क़ाब देकर स्वयं अपने वतन में वापस जाने की इच्छा व्यक्त की।

    इससे पीर रामदेवजी महाराज ने उन्हें प्रेम से विदाई दी और पीपली की एक डाली पर बैठाकर उनके वतन में विदा किया।

  4. पीराई के परचों का संक्षिप्त परिचय

    रणुंजा के राय पीर रामदेवजी महाराज ने अपने जीवनकाल के दौरान बावन परचों के प्रमाण दिए हैं। जब-जब किसी कारण से भक्तों पर संकट पड़े हैं और उन्होंने आराध किया है, तब-तब उन्होंने परचे पूरे किए हैं और पीराई का प्रमाण दिया है।

    प्रथम तो कुंकुम के पगले पधारकर उकलती देग उतारी; दर्जी की दानत बिगड़ने पर उसके बनाए कपड़े के हरे घोड़े को आकाश में उड़ाया और स्वयं सवार हुए। उन्होंने एक पल में भैरव को भूमि में भंडार दिया। लाखा वणजारा कर न भरने की गणना से उनके पास झूठ बोला तो उसकी मिसरी (शक्कर) नमक बन गई। फिर उसने माफ़ी माँगी तो नमक की मिसरी बना दी। वाणिया धनपाल सेठ परदेश से कमाकर आते समय मझधार में तेज़ हवा और तूफ़ान के कारण जहाज़ डोलने लगे। सेठ ने रामदेवजी को पुकार किया तो महल में चौपाट खेल रहे पीर रामदेवजी महाराज ने अपनी भुजा पसारकर उस डूबते जहाज़ को किनारे लाकर रख दिया।

    उन्होंने अपने भक्त हरजी भाटी को अनेक परचे दिए हैं। हरजी भाटी कपड़े का घोड़ा लेकर गाँव-गाँव विचरते थे और घोड़े की सेवा-पूजा-आरती करते थे। वे जोधपुर जा चढ़े। इस समय जोधपुर के राजा को कानभंभेरणी होने पर उन्होंने हरजी भाटी को जेल में डाला और उनकी शक्ति को मापने के लिए कपड़े के घोड़े को घास का नीरण करके मुँह पर लोहे के चने का पावरा चढ़ाया गया। हरजी भाटी ने श्री रामदेवपीर का आराध करते ही रात में घोड़ाहार में पच्चीस घोड़े उपस्थित हुए और धमसाण मचा दिया, और कपड़े के घोड़े ने लोहे के चने का पावरा और घास आरोग लिए। राजा ने यह सुनते ही उन्हें जेल से छोड़ा और वहाँ श्री रामदेवजी महाराज की स्थापना की। इसके सिवा चैत्र-वैशाख महीने में कानकुँवारी बकरी ने दूध दिया और गर्मी के ताप में सूखी तलावड़ी को पानी से भरी बनाया और पानी की झारी भरने का परचा भी उन्हें दिया। फिर भी दृढ़ भरोसा, विश्वास आना कठिन था।

    श्री रामदेवपीर ने राणी नेतलदे के अष्टवंका अंग को हस्तमेलाप के समय सुंदर बनाकर अंग की पीड़ा मिटाई। पीर रामदेवजी महाराज के विवाह के बाद के सामैये के समय सगुणाबेन का कुँवर भानजा गगुभा चिरनिद्रा में पौढ़ गया था। उन्होंने भानजे को गहरी निद्रा से जागृत करके सगुणाबेन का संकट मिटाया। उसी सगुणाबेन को इस विवाह में आते समय दिल्ली के चोरों ने लूटा था। उनकी पुकार सुनकर श्री रामदेवपीर पल में हाज़िर होकर चोरों को पकड़ा। दिल्ली के बादशाह को उसकी बददानत के कारण पलंग से पछाड़कर परचा दिया। उन्होंने अजमेर में पीर के रूप में पहचाने जाते क़तीबशा बादशाह को भी अपनी पीराई का परचा बताया और परिणामस्वरूप वे भी श्री रामदेवपीर को नमी पड़े। उसके बाद क़तीबशा बादशाह सत्य सनातन धर्म की राह पर जुड़े और महाधरम के पंथ में वे महान पुरुष के रूप में प्रख्यात हुए।

    ब्रह्मनिष्ठ सद्‌गुरु श्री सवाराम साहेब ने पीर रामदेवजी महाराज के व्यापक स्वरूप को आवरित करके परचों का परिचय देती पद रचनाएँ की हैं, उनमें से एक रचना यहाँ दी है।

    सावळ

    पीर की पल-पल बलिहारी रे, पीर की पल-पल बलिहारी अखंड ज्योत अविनाशी आपकी व्यापक जाऊँ वारी...टेक... अजमलजी के बोल से बँधाए द्वारकाधारी, वचन निभाने पिता-पुत्र होकर आए गिरधारी;...पीर की...१ पोठ भरकर आया वणजारा, माँही मिसरी भरी सारी, परपंच किया था पीर के आगे तो नमक कर डारी;...पीर की...२ मझधार में पुकारे वाणिया, धणी करजो लीले असवारी, चौपाट खेलते भुजा पसारी डूबती जाज तारी;...पीर की...३ इल्म फ़कीरी आज़माने मक्का से पीर आए भारी, वली-औलिया विस्मय होकर कहते हैं यह तो फूल कला है न्यारी;...पीर की...४ बहन सगुणा करे सामैया जिसके हृदय शोक भारी, कुँवर गगुभा किए सजीवन, तब हिंदवा हाँक मारी;...पीर की...५ चरण पकड़कर पड़ा चरणों में, धुन धणी धारी, दास सवा दरगाह का चाकर, डूबती बेड़ी तारी;...पीर की...६

    इस प्रकार रणुंजा के राय पीर रामदेवजी महाराज ने पीराई प्रगट करके हिंदू धर्म में खूटती कड़ी मिलाकर दी।

    इस प्रकार, विश्व में सत्य सनातन धर्म की ध्वजा फहराने रणुंजा के राय पीर रामदेवजी महाराज वि. सं. १४६१ के भादरवा सुद-११ के दिन पोकरणगढ़ में प्रगटे। वीरमदेजी ने अजमलजी के घर अवतार लिया है, पर श्री रामदेवजी महाराज स्वयं सवा महीने में पालने में आकर पौढ़े हैं। वे अवतारी पुरुष सही, पर उन्होंने अवतार लिया नहीं। माता की कूख से जन्म लिया नहीं। इसलिए वे अजन्मा कहे जाते हैं। भारत में केवल दो ही पुरुष अजन्मा हैं। उनमें एक रणुंजा के राय पीर रामदेवजी महाराज और दूसरे कबीर साहेब। कबीर साहेब भी सत्य सनातन धर्म के लिए पधारे थे। उनका प्रागट्य भी अलौकिक और दिव्य है। वे काशी नगरी के लहरतारा सरोवर में कमलपुष्प पर प्रगटे हैं। उस बात की जानकारी वाणी में मिल आती है।

    जेठ सुदी पूनम तिथि सोमवार शुभ जान, संवत चौदह सौ छप्पन सद्‌गुरु प्रगटे आन। गगन मंडल से उतरे सत्यपुरुष कबीर, जलज माँही पौढ़न कीया सब पीरन के पीर।

    इस प्रकार, पीर रामदेवजी महाराज और कबीर साहेब — ये दोनों अजन्मा सही, पर इन दोनों में कुछ फ़र्क नहीं है। केवल उनकी कार्यवाही में ही फ़र्क दिखाई देता है। कबीर साहेब स्वयं सतपुरुष के आदेश से इस पृथ्वी पर जीवों को चेताने के लिए पधारे थे। वे स्वयं नौतम सुरती हंस उजागर पुरुष थे। वे सत्रहवीं कला लेकर ओदरे थे। उन्होंने काशी में प्रगट होकर सात दीप और नौ खंडों में भक्ति का परिभाव डाला है। उसकी साख वाणी में मिल आती है।

    भक्ति दिलावर देश की लाए गुरु रामानंद, साहेब कबीर ने प्रगट की सात दीप नौखंड।

    पीर रामदेवजी महाराज भी सत्रहवीं कला लेकर ओदरे हैं। उन्होंने पीराई के साथोसाथ सनातन धर्म की कार्यवाही भी बजाई है।

    वे संत मेलावड़ों में भी जाते और गतगंगा में मनुष्य कृति के फ़र्ज़ या कार्यवाही बजाते रहकर पीराई छिपाकर रखते। उस समय भारत में धर्म की रीति से अच्छे-अच्छे पुरुष थे। जेसल-तोरल, मालदे-रूपादे, मेघ घारवो, गुरु उगमशी, क़तीबशा बादशाह, हुरलबाई, पीर जेतो, खीमरो कोटवाल, लीरलबाई वगैरह उस समय सत्य सनातन धर्म की राह पर थे और धर्मकार्य के लिए संत मेलावड़ा योजते रहते।

    पीर रामदेवजी महाराज बारह बीज के धणी कहे जाते हैं। उन्होंने एक ही समय अलग-अलग स्थल पर अपनी बिरद और रीति के अनुसार बारह संप्रदायों के पाटपूजन में हाज़िरी दी थी। वे बारहों संप्रदाय की उत्पत्ति बीज से, पर स्वयं तो बीज से बाहर थे। संप्रदाय, रीति और कार्य के अनुसार बारह बीज के धणी, पर स्वयं बीज से न्यारे थे, अजन्मा थे।

    वे अधम उद्धारण हैं। अधर्मी का उद्धार करने वाले हैं। धर्मी का तो अपने आप अपनी कमाई द्वारा उद्धार होता है। पीर के पास नेकी-टेकी बहुत ज़रूरी है। वहाँ अदल इंसाफ़ होता है। इस कलियुग में अब उनकी कार्यवाही का समय आ गया है।

  5. पूर्व के अनुसंधान से पीपली में पधरामणी

    भजन-गरबी

    गाँव पीपली में पीर का धाम है रे; वहाँ समरथ संत सवाराम हैं रे...गाँव...टेक... जिनकी नौखंड में नौबतें गड़गड़ाएँ रे; फरके धोली ध्वजा के निशान...गाँव...१ प्रेम से उतरे पीर की आरती रे; शंख-झालर का झणकार...गाँव...२ नर-नारी जाकर नमन करें रे; भाव से दर्शन को आएँ बड़े भूप...गाँव...३ वहाँ मूरति में राधा और श्याम हैं रे; साथ में गणेश और यति हनुमान...गाँव...४ दास बलदेव सर्व को दिखावे रे; पीर के दर्शन करने से दुःख जाए...गाँव...५

  6. प्रगट पीराणा पीपलीधाम

    बहुत वर्ष पहले ब्रह्मनिष्ठ सद्‌गुरु श्री बलदेवदास महाराज ने जब उपर की पद रचना की, तब पीपली गाँव की प्रख्याति नहीं थी और यहाँ केवल गिने-चुने व्यक्ति ही दर्शन को आते थे। पर महापुरुष के शब्द मिथ्या नहीं होते। उनमें भावी का संदर्भ रहा होता है।

    आज वास्तव में पीपली गाँव पीपलीधाम बन गया है। आज उसका परिभाव दिखाई दे रहा है। उस पद रचना के शब्द 'भाव से दर्शन को आएँ बड़े भूप...' साबित हो रहे हैं और पीपलीधाम में देश-परदेश से दर्शनार्थी दर्शन के लिए पधार रहे हैं। आज विश्व में उसका प्रभाव पसर रहा है। ब्रह्मनिष्ठ सद्‌गुरु श्री सवाराम साहेब के नाम के प्रताप से श्री बलदेवदास महाराज द्वारा पीपलीधाम में विराजित स्वयं रणुंजा के राय पीर रामदेवजी महाराज का प्रकाश जगमगाते हुए चारों ओर फैल रहा है। कारण-कार्य और समय को अनुलक्षित करके स्वयं दिए कोल-करार के अनुसार अनंत ब्रह्मांडों के नाथ पीर रामदेवजी महाराज जहाँ उन्हें योग्यता दिखाई देती है, वहाँ पधारते हैं।

    उसके अनुसार झालावाड़ पंथक के पीपली गाँव में प्रजापति कुल में श्री सवाराम बापा के घर रणुंजा के राय पीर रामदेवजी महाराज पधारे। पूर्व के किसी निकट के अनुसंधान से, पूर्व की कोई ग्रंथि अनुकूल बनते हुए वि. सं. १९६८ में रणुंजा के राय पीर रामदेवजी महाराज ने रात में उनके घर पधारकर उन्हें वास्तव में स्वप्न द्वारा गहरी नींद से जगाकर वचन देते हुए कहा कि, 'सवा, मुझे तेरे यहाँ कायमी बैठना है। निवास करना है, यहाँ अखंड सदाव्रत शुरू होगा और ईशान कोने में बावन गज का नेजा फरकेगा — ऐसा मेरा वचन है।'

    श्री सवाराम साहेब के पास भीतर की दौलत तो भरपूर थी, पर बाहरी दौलत का अभाव वर्तता था। पीर रामदेवजी महाराज के शब्द सुनकर अपनी कमज़ोर आर्थिक परिस्थिति को अनुलक्षित करके उन्होंने कहा कि, 'मैं नेजा कहाँ चढ़ाऊँ? मुझसे तो वह बन सके ऐसा नहीं है। फिर भी आपकी आज्ञा हो तो हमारे घर एक लीमड़ी है, उस पर चढ़ाऊँ...'

    यह सुनकर पीर रामदेवजी महाराज ने कहा कि, 'तू चिंता न करना। तू किसी भी जाति की फ़िक्र न करना। तेरी जोगवाई हो या न हो, पर मुझे तेरे यहाँ बैठना है। यह तो पूर्व का कोई निकट का अनुसंधान है, पूर्व का कोई निकट का नाता है, पूर्व की कोई ग्रंथि है, इसलिए यह अनुकूल बना है। आगे समय अनुकूल बनते ही अनायास जिस पुरुष के हाथ से जो कुछ बनने वाला होगा, वह बनेगा...'

    ऐसे अलौकिक रहस्यभरे उत्तम शब्द सुनकर श्री सवाराम साहेब ने कहा कि, 'भले, जैसी आपकी इच्छा...'

    इस प्रकार रणुंजा के राय रामदेवजी महाराज ने स्वेच्छा से सामने चलकर श्री सवाराम साहेब से मिलकर पूर्व का निकट का अनुसंधान अनुकूल बनाकर, भविष्य में आगे यहाँ की अपनी कार्यवाही किसी अन्य महापुरुष द्वारा अनुकूल बनने वाली है — ऐसा गर्भित सूचन करके भावी संकेत दे दिया और उनके यहाँ कायमी बैठने का वचन दिया।

    समस्त ब्रह्मांड में जिनकी सत्ता विलस रही है, ऐसे चौदह लोक के नाथ रणुंजा के राय पीर रामदेवजी महाराज के वचन के अनुसार श्री सवाराम साहेब के घर अनासुरती अनाज का आगमन होते ही अन्नक्षेत्र शुरू हुआ। यह अखंड सदाव्रत वि. संवत १९६९ से (ई. स. १९१३ से) एकधारा अविरत रूप से चल रहा है।

    तत्पश्चात वि. संवत १९७० में श्री रामदेवपीर के घोड़े का अनासुरती आगमन हुआ। श्री रामदेवपीर पीठ का प्रतिष्ठा महोत्सव उजवाया, वहाँ तक श्री झबुबाई की हाज़िरी में संतों-भक्तों ने मिलकर इस घोड़े को श्री सवाराम साहेब के घर स्थान दिया।

    तत्पश्चात श्री रामदेवजी महाराज की इच्छा और प्रेरणा से श्री रामदेवपीर पीठ के निर्माण की कार्यवाही अनायास अनुकूल बनी। मंदिर के बांधकाम के दौरान जब-जब जैसी-जैसी प्रकार की ज़रूरत पैदा हुई, तब-तब प्रेरणादिक बनकर अनेक परचे देकर वह ज़रूरत संतोषी। इस समय के दौरान पीपली के नगरसेठ लक्ष्मीचंद कालीदास संघवी का जीवलेण दर्द मिटाकर जीवतदान दिया। मंदिर की ईंटों के पैसों की ठगाई करने वाले धुड़ा चोर को बजाणा के पुलिस थाने में हाज़िर करवाया। मंदिर के लिए लकड़ी का कटमाल ख़रीदने भावनगर गए पीपली के पटेल भाइयों के पैसे खूटते ही भावनगर की लकड़ी की लाटी में श्री रामदेवपीर ने सोनी सेठ के रूप में पधारकर ७०० रुपये भरपाई किए।

    इस प्रकार, वि. संवत १९७२ में श्री सवाराम साहेब के हस्तक बने श्री रामदेवपीर पीठ का प्राणप्रतिष्ठा महोत्सव बहुत आनंद और उल्लासभरे वातावरण में धामधूम से उजवाया गया। इस प्रसंग पर हुआ हज़ारों रुपये का खर्च पीर रामदेवजी महाराज की कृपा से भरपाई हो गया था। स्वयं पीर रामदेवजी महाराज घोड़ेसवार पुलिस अमलदार के स्वांग में, संत सभा में बैठे जीवणगर को पकड़ने के निमित्त पधारकर प्रसंग को परिपूर्ण सफल बनाया। वे संत सभा को विमासण में डालकर, भुलावे में डालकर अदृश्य हो गए थे।

    इस संत सभा में रापर (कच्छ) के महंतश्री अमरदासजी बापू, समी तालुका के कुँवरधाम के महंत श्री हरद्वारपुरीजी बापू तथा ध्रुमठ के महंत श्री केशरभारथीजी बापू हाज़िर थे। श्री सवाराम साहेब का देशी नलियों वाला मिट्टी का सामान्य घर मंदिर बना। (यह तमाम जानकारी 'श्री सवाराम साहेब की अमरधारा' नामक ग्रंथ में सविस्तर रूप से दी गई है।)

    इस समय भावी के किसी अनुसंधान से सूचक रीति से रणुंजा के राय पीर रामदेवजी महाराज की गुम रहकर गेबी रीति से कार्य करने की इच्छा होने से श्री रामदेवपीर पीठ में द्वारकाधीश श्रीकृष्ण-रुक्मिणी की मूर्ति की स्थापना की गई। श्री रामदेवपीर को श्री सवाराम साहेब के स्व-हस्ते युक्तिपूर्वक गेबी स्थान दिया गया। (श्री सवाराम साहेब ने भी अपनी सत्ता छिपाकर रखी थी।) इस प्रकार श्री रामदेवपीर पीठ में द्वारकाधीश विराजमान हुए हैं।

    इस प्रतिष्ठा महोत्सव के प्रसंग पर वेदोक्त रीति से विष्णु महायज्ञ का आयोजन भी किया गया था और पीराणे के स्तंभ का रोपण करके उस समय बावन गज का नेजा फहराया गया था।

    इस प्रतिष्ठा प्रसंग पर सांतक में बैठना था। इसलिए श्री सवाराम साहेब की धर्मपत्नी श्री यमुनामा ने झबुबा से कहा कि, 'मुझे तो मेरे जीवन में लाभ मिला है, बापा के पड़खे आप बैठो तो अधिक अच्छा...'

    (जमनामा) यमुनामा और झबुबा के बीच परस्पर गाढ़ प्रेम था। यमुनामा के ऐसे शब्द सुनकर झबुबा ने कहा, 'मुझे बैठने में कोई आपत्ति नहीं, परंतु यदि मैं अकेली गुरुमहाराज के पास बैठूँगी तो इस जगत के लोग ऐसे शब्द निकालेंगे कि मैं वह सहन नहीं कर सकूँगी; परंतु यदि आप अपना स्थान सँभालो तो मैं बैठने को तैयार हूँ...'

    तो उस समय आज जिस रीति से श्री सवाराम साहेब, यमुनामा और झबुबा की समाधि है, उस प्रकार सांतक में बैठे थे। तब यह देखकर जगत के लोग श्री सवाराम साहेब और झबुबा की इतनी निंदा करते थे कि जो सुनी भी न जा सके। फिर भी उन्होंने अपने मन पर कोई असर होने नहीं दिया था। झबुबा उनकी शिष्या थीं और उनकी आधीनता, आजीजी और प्रेम के वश होकर श्री सवाराम साहेब ने उन्हें वचन दिया था कि, 'जा, मैं तुझे पड़खे रखूँगा...' इसलिए उनकी समाधि यहाँ उसी रीति से है।

    यह समग्र कार्यवाही स्वयं चौदह लोक के नाथ की इच्छा से बन रही है, इसका प्रमाण भी उस समय दे दिया और उस बात को पृथ्वी रहे तब तक की कायमी अचल बात बना दी।

    बना ऐसा कि जब पीराणे का स्तंभ रोपने का मुद्दा उपस्थित हुआ, तब वह कहाँ रोपना, वह कहाँ रोपना — यह प्रश्न हुआ। इसका हल गेबी पुरुष ने दे दिया। वह पुरुष रात में श्री सवाराम साहेब के सम्मुख प्रगट हुए और कहा कि, 'आने वाले कल सुबह जिस जगह नागदेव के दर्शन हों, उस स्थल पर स्तंभ रोपना...' श्री सवाराम साहेब को शेषनारायण भगवान के साथ भी नाता था। उन्हें उँगली में डंक देकर मिट्टी काम के धंधे से मुक्त करवाने वाले भी नागदेव थे।

    अब गेबी पुरुष के सूचन के अनुसार दूसरे दिन सुबह मंदिर के प्रांगण में नागदेव पधारे। हाज़िर रहे संतों-भक्तों ने उनके दर्शन किए। श्री सवाराम साहेब मन ही मन वह संकेत, वह स्थल समझ गए। वह पुरुष जिस जगह प्रगट हुए थे, वहाँ चौरस खड्डा खोदा गया और एक चौरस पत्थर को कोरकर उसमें स्थापित किया गया। उसमें स्तंभ रोपने के लिए गोलाकार भाग कोरा गया था। उस चौरस पत्थर के गोलाकार में स्तंभ का रोपण किया गया और उसके ऊपर उस समय बावन गज का नेजा फहराया गया था। कदाचित समय-संजोग के अनुसार स्तंभ बदलने की ज़रूरत पैदा हो तो मूल बात को अकबंध रखकर केवल उस स्तंभ का फेरफार किया जाता है।

    इस प्रकार इस ईशान कोने में श्री रामदेवपीर का नेजा है। उनका निशान है। पर उस नेजे को धारण करने वाला, पकड़ने वाला पुरुष अलग है। वह नेजाधारी पुरुष अलग है। यहाँ तो उनके कायमी बैठने हैं। ब्रह्मनिष्ठ सद्‌गुरु श्री बलदेवदास महाराज ने अपने एक पद में इस बात को आवरित करके बताया है कि,

    ध्वजावाले ने धरम चलाया, रोपा पीपली में पाया, पोकर से पीर स्वयं पधारे, नौखंड नाम दीपाया।

    सादी व्याख्या में कहा जा सकता है कि पहले सदाव्रत चालू हुआ। फिर नेजे का वचन दिया, इसलिए स्तंभ रोपा गया। वह धर्म का पाया रचा गया। पहले वे बातें थीं कि सदाव्रत और बावन गज का नेजा। नेजा रखना किस पर? इसलिए स्तंभ रोपा। यदि स्तंभ न रोपा गया होता तो धर्म का पाया न पड़ा होता। पीराणे की जगह के सिवा स्तंभ न हो। ईश्वर इच्छा से वह बने तो ही बराबर। अपनी इच्छा से स्तंभ रोपा जाए तो वह बराबर नहीं — ऐसा महापुरुषों का मानना है। तो वे पोकरणगढ़ के बादशाह पीर रामदेव स्वयं स्वेच्छा से पीपली पधारकर नौखंड में नाम दीपा रहे हैं।

    श्री सवाराम बापा को पीर रामदेवजी महाराज मिले, उसी अरसे में अजन्मा पुरुष कबीर साहेब भी आ मिले। कचोलिया गाँव में हंसदास साहेब के स्वरूप में पधारकर श्री सवाराम बापा को गुरुघर का (साहेब घर का) अमूल्य भेद — अमरभेद — शान द्वारा संपूर्ण रूप से बख़्शीश करके साहेब का स्वरूप बनाया था। तो श्री सवाराम साहेब सचमुच कौन पुरुष होंगे कि जिससे सत्रहवीं कला लेकर ओदरे दो अजन्मा पुरुष स्वेच्छा से सामने चलकर आ मिले।

    इस बात का निखालस बुद्धि से गहन विचार करते हुए जिज्ञासु उस अनुसंधान के रहस्य को समझ सकने में समर्थ बनना संभव है। जोग भी कैसा साधा कि बावन गज के नेजे का वचन देने वाले पीर रामदेवजी महाराज ने परचे भी बावन पूरे किए हैं और श्री सवाराम साहेब को मिले भी बावनवें वर्ष! श्री सवाराम साहेब का प्रागट्य वि. सं. १९१७ के महासुद-१५ के दिन हुआ था और पीर रामदेवजी महाराज मिले वि. सं. १९६८ के उत्तरार्ध में। कबीर साहेब भी समय के थोड़े अंतर पर उसी अरसे में मिले थे।

    सचमुच तो रणुंजा के राय पीर रामदेवजी महाराज का वास्तविक स्वरूप कोई जुदा ही होगा। उन्होंने स्वयं ही पड़दे होने से पहले गतगंगा को किए फ़रमान के अनुसार स्वयं कोई भी नाम, रूप, कुल धारण करके अवतार धारण करते रहते हैं। समय के अनुसार धर्म की स्थापना और संतों की रक्षा हेतु वे किसी भी ज्ञाति में आते हैं। वे निजारी पुरुष हैं — उनका सचमुच स्वरूप निजारी है, इसका महापुरुषों के शब्दों द्वारा जानने को मिलता है।

    इसके अनुसंधान में ब्रह्मनिष्ठ सद्‌गुरु श्री बलदेवदास महाराज ने श्री सवाराम साहेब के यथार्थ परिचय के दर्शन करवाते हुए अपने एक पद में बहुत सुंदर और स्पष्ट रीति से यह बात प्रस्तुत की है।

    भजन

    प्रगटे संत सवाराम, आकर किए बहुतों के काम...टेक... अनेक पंथ अलग करके, निजारी धराया नाम, यमपुरी से जाते छुड़ाकर, वैकुंठ में करवाया मुकाम...१ हुकम लेकर हज़ूर का, पधारे पीपली गाँव, हंस उबारण कारण, जिसने बाँधा धरम का धाम...२ सोहंग स्वामी सद्‌गुरु साहेब, लेवा उनके नाम; विश्व सारे में व्यापे रहे, ठाला नहीं एक भी ठाम...३ सद्‌गुरु ने हमें शान समझाई, पूरी मन की हाम; दास बलदेव दोई कर जोड़ी, मुझे भेटे सुंदर श्याम...४

    इसके अतिरिक्त उन्होंने अपने दूसरे एक पद 'सवाराम गुरु की गति न्यारी रे, भेटे हमें आरे घड़ी...' में भी अंतिम चरण में श्री सवाराम साहेब का भीतर का वास्तविक परिचय प्रस्तुत किया है। काफ़ी राग के इस पद की वे पंक्तियाँ नीचे के अनुसार हैं।

    अवनी में प्रगटे ऐसे हंस, साहेब आए स्वरूप धरी; कहे बलदेव संतों के बाल, आ मिले अलख धणी; फेरा इस बार फावा रे, गुरु रीझे और दी मुक्त मणी...

    इस प्रकार, यहाँ शब्द द्वारा श्री सवाराम साहेब के स्वरूप का स्पष्ट दर्शन करवाया है। निखालस हृदय के जिज्ञासु उसे समझ सकेंगे।

    उनमें आंतरिक शक्ति तो जो थी वह थी ही। वह छिपी शक्ति जैसे-जैसे समय व्यतीत होता जाता है, वैसे-वैसे उनकी आत्मशक्ति, स्वयं अपनी शक्ति प्रकाशित होती जाती है। वे स्वयं अपना पहले का खाता लेकर आए थे। वे रजकण उनमें थे। उनके द्वारा जो कार्य की सफलता प्राप्त की, वह उनका ही प्रताप है। प्रेरणादिक भले कोई भी व्यक्ति बने — चाहे साहेब या रामदेवजी महाराज या तो गुरु महाराज।

    चौदह लोक के नाथ रणुंजा के राय पीर रामदेवजी महाराज की पीराई की ख़ात्री करने जब मक्का-मदीना से पाँच पीर और बावन हज़ार औलिया आए थे, तब उन्हें पीर रामदेवजी महाराज ने पीराई बताकर उनके मन को संतोष पमाया और उन पीरों ने उन्हें 'हिंदवा पीर' का इल्क़ाब दिया। अब जब ये पीर-औलिया पधारे तब रणुंजा के राय पीर रामदेवजी महाराज ने उन्हें पीपली की छाँव में सवा हाथ की जाजम पर आसन दिया था और सवा सेर चावल में उन सभी को मनभावती मनवांछित वानगी परोसी थी।

    यह एक अनुसंधान था। संज्ञा थी, संकेत था, रहस्य था। उन्होंने सवा के साथ संबंध रखा था। उन्होंने सवा के साथ निकट का अनुसंधान मिलाया था। सवा, पीपली और मुस्लिम पीर-औलिया — पीर रामदेवजी महाराज के इस अनुसंधान में कोई गर्भित इशारा था कि जतवाड़ के पीपली गाँव में सवा नामधारी पुरुष के रूप में स्वयं प्रगट होंगे और समय आने पर स्वरूप बदलकर विश्व में सत्य सनातन धर्म की महिमा प्रसारित करके सतयुग का मंडाण करेंगे।