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ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु श्री सवाराम साहब

श्री रामदेवपीर पीठ — पीपलीधाम

  1. प्रागट्य और भजन प्रेम

    मातुश्री छे काशीमा, पिता कृष्ण मुज तात । स्वामी फूलगरजी सद्गुरु, सदा सवो नीज दास ॥

    सनातन धर्म और आध्यात्मिक क्षेत्र में भारत की पावन भूमि पहेले से ही अग्रेसर रही है । सत्य सनातन धर्म की स्थापना इस धरती पर हुई है । अवतारी पुरुष भी भारत में प्रगट हुए है । इस भूमि पर महान ऋषिमुनि, सिध्ध साधक, योगी, ध्यानी, पीर, फकीर, जति, सति जितने भी पैदा हुए है इतने ओर किसी भी देश में या धरती में पैदा नहीं हुए है । ऐसे महान भारत में मनुष्य जन्म पाना वो सद्भाग्य है । और सच्चे संत पुरुष का मिलन और संग होना वो तो परम भाग्य है ।

    ऐसे भारत देश में सौराष्ट्र की भूमि संतो की भूमि मानी जाती है । इस सौराष्ट्र में सुरेन्द्रनगर नामक एक जील्ला है । इस जिल्ले के पीपली गाँव में श्री सवाराम साहब के घर रणुजा के राय बाबा राम देव पीर पधारे है ।

    ये पीपलीगाँव श्री सवाराम साहब की प्रागट्य भूमि है । उनका प्रागट्य वि.सं. १९१७ में माघ सुद १५ के दिन हुआ था । वे प्रजापति कूल के थे । उनके पिताजी का नाम श्री करशनदास और माताजी का नाम काशीमा था । वे दोनो संस्कारी संतप्रेमी और भक्तिवान थे । उनका व्यवसाय मिट्टी के बरतन बनाने का था ।

    श्री सवाराम साहबने बचपन से ही पिताजी की छत्रछाया गंवा दी थी । मतलब कि श्री करशनदास का देहांत हो गया था । इसलिए बचपन से ही घर का आर्थिक बोज उठाने की जिम्मेवारी आने से उनकी पढाई सिर्फ एक ही कक्षा तक सीमित रह गई ।

    बाद में उनका विवाह सुसंस्कारी श्री जमना मां से हुआ । दांपत्य जीवन के फल स्वरूप उनको दो सुपुत्र श्री नानजीभाई और श्री हरजीवनदास हुए ।

    श्री सवाराम साहब असाधारण पुरुष थे । संसार के पामर जीवों को चेताने के लिए, उनको मोहनींद से जगाने के लिए उनका आगमन हुआ था ।

    इसलिए युवानी की उम्र में ही उनको प्रभुभजन के प्रति लगाव पैदा हुआ । भजन-सत्संग के प्रति प्रेम पैदा हुआ । जहां भी भजन सत्संग हो और उनको आमंत्रण मिले तो वे वहाँ पहुँच जाते थे । बाद में उनको भजन गाने की लगन लगी और ‘हे जाडेजा करी लो कमाणी थोडा जीवणा रे’’ ये तोरल दे का भजन उन्होंने पहले गाना शीखा ।

    हमारे संतो और पवित्र ग्रंथो के मतानुसार गुरु बिना ज्ञान नहीं मिलता । नुगरे इन्सान की कोई किंमत नहीं है । श्री सवाराम साहब के गुरु का नाम स्वामी फूलगरजी महाराज था । वे ध्रांगध्रा तालुका के सोखडा नामक गाँव के दशनामी अतीत साधु थे । उन्होंने श्री सवाराम साहब को नाम भजन का महत्व समजाते हुए कहा कि इस नाम भजन से आगे समय आने पर तुम्हें सबकुछ स्वयं आके मील जाएगा ।

    इसके बाद श्री सवाराम साहब को भजन और संतो के प्रति इतना लगाव हुआ कि उनको अपने धंधे का भी ख्याल नहीं रहता था और माताजी उनको डांटते भी थे । माताजी के डांटने पर वे उनको विवेकपूर्ण ज्ञानयुक्त उत्तर देते थे ।

  2. श्री काशीमां का अंतिम दिव्य समय

    श्री काशीमां अंकुरी महान आत्मा थे । उनके गुरु ध्रुमठ गाँव के श्री केसर भारतीजी महाराज थे । श्री काशीमाने अपने अंतिम समय की जानकारी पहेले से ही दे दी थी । और उस समय की जरूरी तैयारी भी उन्होंने स्वयं कर रखी थी । ये बात उनकी दिव्यता प्रगट करती है । जब उनका अंतिम समय आया तो उन्होंने कहा, ‘‘आज मेरा देहत्याग का दिन है । इसकेलिए जरूरी गौ के गोबर का मैंने खेंगारभाई भरवाड को कह दिया है । बादमें तीसरे दिन तैरैयो रखने के लिए अपने घर का मिट्टी का घडा या कुंभ चाहिए तो वो आप बनाके रखो ।’’

    बाद में श्री काशीमांने अपने अंतिम समय पर अपने गुरुमहाराज की उपस्थिति में श्रीयमुना मा ( जमनामा ) के हस्तक प्रसाद ले कर सतलोक की ओर प्रयाण किया ।

  3. रणुजा के राय पीर रामदेवजी महाराज का बचन

    भारत में श्री कबीर साहब और पीर रामदेवजी महाराज ये दोनों अजन्मा पुरुष है । श्री कबीर साहब काशीनगर के लहर तालाब में कमल पुष्प पर प्रगट हुए थे और श्री रामदेवजी महाराज राजस्थान के पोकरण गढ में कंकु पगले पधारे थे । सनातन धर्म की धजा लहेराने के लिए उनका आगमन हुआ है । वो दोनों पुरुष श्री सवाराम साहब को आके मीले है और अपनी सत्ता और साह्यबी का तार उनसे मीलाया है ।

    वि.सं. १९६८ की साल पीपलीगाँव की अकालग्रस्त साल थी। इसलिए श्री सवाराम साहब उसी साल वीरमगाम के पास कचोलिया गाँव अपने व्यवसाय के लिए गये थे । वहां वे दिन को बरतन बनाते थे और रात को भजन-सत्संग करते थे । एक शाम कुदरती साहब कबीर हंसदास के रुप में यहां पधारे । उनके आने का मकसद ( हेतु ) श्री सवाराम बापा को अमूल्य भेद बक्षिस करने का था । ये पूर्व का कोई संकेत था । इसलिए श्री हंसदास साहबने उस रात श्री सवाराम बापा को गुरुघर का अमर भेद ( रहस्य ) शान के झरीये बक्षिस किया ।

    इस तरह श्री हंसदास साहबने श्री सवाराम बापा को साहब घर का संपूर्ण भेदबक्षिस करके साहब का रुप बनाया । बाद में बारीश की वजह से अच्छा वर्ष आने से वे पीपली वापस लौटे ।

    हंसदास साहब मिलने के बाद इसी ही साल में रणुजा के राय श्री रामदेवजी महाराज भी श्री सवाराम बापा को आके मिले । एक रात श्री रामदेवजी महाराज श्री सवाराम साहब के घर पर पधारे और उनको बचन देते हुए कहा कि, ‘‘सवा, मुझे तेरे यहां हंमेश के लिए बैठना है। यहां अखंड सदाव्रत शुरुहोगा और घोडा आएगा । फिर यहां इशान कोने में मेरा बावन गज का ध्वज ( नेजा ) लहेरायेगा ऐसा मेरा बचन है ।

    श्री सवाराम साहब की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी । इसलिए उन्होंने श्री रामदेवजी महाराज को कहा कि, ‘‘मैं ध्वज कहाँ लहेराउँ ? मुझसे तो ये हो नहीं सकता । फिर भी आपकी आज्ञा हो तो यहाँ घर पर एक नीम का पेड है तो उस पर लहेराउँ ।’’

    ये बात सुनकर श्री रामदेवजी महाराजने कहा कि, ‘‘तुम चिंता फिकर मत करो । तेरी शक्ति हो या न हो फिर भी मुझे तेरे यहाँ बैठना है । हमारा पुराना कोई नजदीकी ( नीजी ) नाता है इसलिए ये अनुकूल हुआ है । आगे जाके समय आने पर जिस पुरुष के हाथों जो बननेवाला है वो बनकर रहेगा ।’’

    श्री सवाराम साहबने उत्तर दिया कि ‘‘जैसी आपकी ईच्छा ।’’

    इस तरह श्री रामदेवजी महाराजने स्वयं अपनी इच्छा से श्री सवाराम साहब को मिलकर हर हंमेश के लिए यहां बैठने का बचन दे दिया ।

  4. बचन के मुताबिक कार्यवाही की शुरूआत

    श्री रामदेवजी महाराज अपने बचन की शुरूआत अखंड सदाव्रत से करते है । वि.सं. १९६९ में श्री सवाराम साहब के घर नाम ठाम का पता दिये बिना अनाज आने का प्रारंभ हुआ और इसी तरह शुरु हुआ सदाव्रत आज तक अखंड चल रहा है । हजारो दर्शनार्थी और संतो यहां भोजन प्रसाद पाकर संतुष्ट होके जाते है ।

    उसके बाद वि.सं. १९७० में श्री रामदेव पीर का घोडा आया । इस घोडे के आगमन से श्री सवाराम साहब के घर में अजीबो गरीब घटनाएँ घटने लगी । अलौकिक घटनाएँ उपस्थित होने से इस घोडे को श्री झबुबाई की उपस्थिति में श्री सवाराम साहब के घर में स्थान दिया गया । श्री राधाकृष्ण देव की मूर्तिवाला श्री द्वारकाधीश रामदेव पीर मंदिर के प्रतिष्ठा महोत्सव तक इस घोडे की सेवापूजा घर में ही होती रही ।

    बाद में श्री रामदेवजी महाराज की ईच्छा और प्रेरणा से श्री रामदेवपीर पीठ के निर्माण की कार्यवाही शुरुहुई । इसके लिए जब जब जिस प्रकार की आवश्यकता खडी हुई तो श्री रामदेवजी महाराज ने प्रेरणादिक बनकर उसी आवश्यकता को परिपूर्ण किया ।

    पीपली गाँव में बहुत साधु संत आते थे । उन सबको ठहरने के लिए विश्राम के लिए श्री सवाराम साहब को पीपली के नगरशेठ लक्ष्मीचंद कालीदास संघवी की जमीन की जरूरत थी, लेकिन वो देने को राजी नहीं थे । फिर ऐसा हुआ कि नगरशेठ को गंभीर बिमारी लागु हो गई । उनकी बचने की या जींदा रहेने की उम्मीदे कम थी । लेकिन श्री रामदेवजी महाराज की कृपा से वो ठीक हो गए । ये चमत्कार देख के नगरशेठ ने अपनी जमीन श्री सवाराम साहब को बेच दी । इस तरह श्री रामदेवजी महाराजने मंदिर के लिए जमीन की सुविधा उपलब्ध करा दी ।

    इसके बाद मंदिर की इंट के पैसे श्री सवाराम साहब से झूठ बोल के ले जानेवाले चोर धूडा को बजाणा पुलीस के हवाले करा दिया । बाद में मंदिर के लिए जरूरी लकडी का सामान खरीदने के लिए पीपली के कुछ पटेलभाई भावनगर गये हुए थे । वहां उन लोगों को पैसे की कमी हुई । लकडे के पूरे पैसे नहीं थे । तो इस वक्त पे श्री रामदेवजी महाराज सोनी शेठ के रुप में वहाँ आए और जरूरी ७०० रूपये उन्होंने भरपाई कर दिये । इस तरह उनकी क्रीपा से मंदिर तैयार हो गया ।

  5. श्री द्वारकाधीश रामदेव पीर मंदिर का प्रतिष्ठा महोत्सव

    श्री सवाराम साहब हस्तक बने हुए इस मंदिर का प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव विक्रम संवत १९७२ बैशाख सुदी ११ के दिन बडी धामधूम से मनाया गया । हजारो भक्त लोग और संत महात्माने इस अवसर पर आकर आनंद किया और भोजन प्रसाद प्रेम से पाया । इस मंगल अवसर का भारी खर्च श्री रामदेवजी महाराज की कृपा से भरपाई हो गया । इस अवसर पर स्वयं श्री रामदेवजी महाराज घोडेस्वार पुलीस अफसर के रुप में अवसर को सफल बनाने के लिए पधारे और बहाना बताया संतसभा में बैठे हुए जीवणगर महाराज को पकडने का । ऐसा कारण बताते हुए सबको अचंबित करके अदृश्य हो गए ।

    इस संतसभा में रापर ( कच्छ ) के महंत श्री अमरदासजी बापु, समी इलाके के कुंवरधाम के महंत श्री हरद्वारपुरीजी बापु और ध्रुमठ गाँव के महंत श्री केशरभारतीजी बापु उपस्थित थे । श्री सवाराम साहब का घर मंदिर के रुप में उभर आया । वो घर मंदिर बना ।

    इस प्रतिष्ठा के मंगल अवसर पर श्री रामदेवजी महाराज की इच्छा गोपनीय रह कर काम करने की थी । इसमें भविष्य का कोई संकेत था । इसलिए इस मंदिर में द्वारकाधिश श्रीकृष्ण की मूर्ति को स्थापीत किया गया है । श्री सवाराम साहब ने स्वयं अपने हाथों से श्री रामदेव पीर को चतुराईपूर्वक गेबी स्थान दिया है । इस तरह इस श्री रामदेवपीर पीठ में श्री द्वारकाधीश बीराजीत हुए है ।

    इस मांगलिक अवसर पर विष्णु महायाग का आयोजन हुआ था और पीराणा के स्तंभ की स्थापना करके बावन गज का ध्वज ( नेजा ) लहराया गया था । यहां स्वयं नागदेव ने आकर जिस स्थान का संकेत दीया था उसी स्थान पर इस स्तंभ का रोपण हुआ है ।

    रणुजा में बाबा रामदेव पीर की पीराई की बहोत चर्चा हो रही थी। दिल्ली तक ये बात पहुंची । उस समय पर दिल्ही में इस्लामी शासन था । श्री रामदेव पीर की पीराई उनके लिए ईर्षा का कारण बन गई। उनकी पीराई की सच्चाई देखने और कसोटी करने के लिए मक्का-मदीना से पांच पीर और बावन हजार ओलिया आये तब उन सबको पांच पीपली के पेड नीचे सवा हाथ लम्बी चटाई पर आसन देके बिठाया था । उस समय सवा शेर चावल में उन सबको मनपसंद भोजन खीलाया था और मक्का मदीना से उन सबके बरतन भी गेबी करामत से यहां ला कर उस बरतन में सबको खीलाया । सब पीर ओलिया अचंबित रह गए और ये पीराई देखकर उनको ‘‘हिंदवा पीर’’ का इल्काब दिया ।

    ये तो एक अनुसंधान था, भेद था, संकेत था । श्री रामदेवजी महाराजने सवा के साथ संबंध-रीश्ता रखा था । ये नीकट का संबंध था । ये एक गर्भित इशारा था । सवा, पीपली और मुस्लीम पीरओलिया। पीपली गाँव, श्री सवाराम साहब और ज्यादातर मुस्लीम जनसंख्या । श्री रामदेवजी महाराज यहां प्रगट हो कर सत्य सनातन धर्म की महिमा को जगत में प्रकाशित करके सतयुग की स्थापना में प्रमुख भूमिका अदा करेंगे एसा संतपुरुषो का मत है । इसी अनुसंधान से श्री रामदेव पीर यहां बीराजमान हुए है ।

  6. नागदेव की शान

    श्री सवाराम साहब के घर मंदिर में अखंड सदाव्रत शुरु होने से यहां हर दिन साधु संत आते रहते थे । इसलिए कभी कभी सदाव्रत के लिए अनाज की कमी महेसूस होती थी । श्री सवाराम साहब अपना व्यवसाय करने के साथ साथ आनेवाले सभी आगंतुक का सन्मान करते रहते थे और सदाव्रत देते रहते थे ।

    एक समय पर उनको सदाव्रत के लिए अन्न की कमी महेसूस हुई। घर में अन्न नहीं था । ऐसे समय परमात्मा को गुजारीश करके मिट्टी के बलोये ( ग्राम्य स्त्रीओं को हाथ में पहनने का कंगन ) बनाएँ। उस पर सोनेरी रंग लगाया और वो बलोया सचमुच सोने जैसा दिखने लगा । इस बलोया को गांव के मुखिया अरजणभाई पटेल के वहां गिरवे रखकर पच्चीस रूपये लाये और सदाव्रत की कमी को हल किया । अरजणभाईने इस बलोया की रवजीभाई सोनी के यहां कसोटी करवाई थी और वो सोने का महेसूस हुआ था । बाद में श्री सवाराम साहब के पास पैसा आते ही उन्होंने बलोया वापस ले लिया और अरजणबाई के सामने ही उस बलोया को जमीन पर पटक कर टूकडो में विभाजीत कर दिया । इस तरह सदाव्रत चलाने के लिए आती हुई कठिनाई का सामना करने के लिए वे कभी ऐसी अकळ कला की अजमायिश भी करते थे । उन्होंने अपने सदाव्रत को कभी भी खंडीत नहीं होने दिया ।

    कठिनाई का ऐसा समय दुबारा आया । उसी समय भी ऐसा बलोया बनाकर घर के भीतर मजुडा में ( एक प्रकार का लकडे का ग्रामीण कबाट ) रखने के लिए अपना हाथ डाला तो अंदर से एक नागदेव अंगुलि पर चीपक गए । ये देखकर सब चिंतित हुए । श्री सवाराम साहब रात भर अकेले अपने कमरे में ध्यानस्थ अवस्था में रहे और सुबह में वो जहर उतर गया । ये एक शान थी, संकेत था । जब श्री द्वारकाधीश रामदेव पीर मंदिर की प्रतिष्ठा थी तब संतोने श्री सवाराम साहब को अपने आपको व्यवसाय बंध करके साधुसंत की सेवा में और भजन में अपना समय व्यतित करने को कहा था । लेकिन श्री सवाराम साहबने उस सूचन पर ध्यान नहीं दीया था । इसी वजह से नागदेव का संकेत था कि आप खुद अपना धंधा मत करो । इस संकेत को समजकर बाद में उन्होंने अपने व्यवसाय से अपने को मुक्त किया और साधुसंत की सेवा और भजन सत्संग में समय का सद्उपयोग करने लगे ।

  7. संतो का मिलन

    ज्ञानी महापुरुष के रुप में श्री सवाराम साहब ने बडे बडे संतो को भी प्रभावित किया था । उनके साथ सत्संग करने के लिए दूर दूर से संत पधारते थे । गेबी पुरुष भी आते थे । सत्य सनातन धर्म की धारा से उनका बहोत संतो के साथ नीजी रीश्ता था । इस तरह दूधरेज के श्री रघुवीर स्वामी, कच्छ के स्वामी दयानंद मुंडीया स्वामी, ध्रांगध्रा के श्री देशल भगत, कुंवरधाम के श्री हरद्वारपुरीजी महाराज, विसनगर के श्री काजी अनवर साहेब, पीपली के मधाजी बापु, नरसिंहपुरा गांव के हीरा भगत, ध्रांगध्रा के श्री नर्मदागीरीजी ( नागाजी ), खारेश्वर ( ध्रांगध्रा ) के श्री न्यालगीरी बापु, ध्रुमठ के श्री केशर भारतीजी महाराज, नागरदास बावा, रापर के श्री अमरदासजी बापु, कडवासण झाडी के श्री देवपुरी स्वामी, गिरनार के सिद्धपुरुष श्री शांतिगीरी नागा वगैरह अनेक संत महापुरुषो के साथ उनका मीलाप होता रहता था । इसके अलावा गिरनार के गेबी पुरुष जमीयल शा दातार, गोपीचंद और भरथरी तथा पीपली की आसपास की भूमि के गेबी पुरुष के साथ भी उन्हे संबंध था । राष्ट्रपिता महात्मा गांधीजीके नीकट के साथी स्वामी आनंद भी मुसीबत उठाके उनके दर्शन के लिए इस्वीसन १९५४ में अपने साथीयों के साथ पीपली पधारे थे और उनकी पूजा की थी । श्री सवाराम साहब की आध्यात्मिक ज्ञानसभर भजन वाणी सुनकर, उनसे प्रभावित हो कर स्वामी आनंद यहां पर आये थे ।

    श्री सवाराम साहब को माउन्ट आबु में अलख पुरुष का दिदार हुआ था । वि.सं. १९८५ में श्री सवाराम साहब रणुजा दर्शन के लिए गये थे । वहां से वापस लौटते समय वे सब माउन्ट आबु आये थे और वहां नखी तालाब स्नान करने के लिए जाते वख्त एक संत उनको गेबी गुफा में ले गये थे । वहां श्री सवाराम साहब को अलख पुरुष का दिदार हुआ था । ये सब जानकारी उन्होंने अपनी एक भजन रचना में दी है ।

  8. बजाणा के कैदखाने की घटना

    श्री सवाराम साहब की राह सनातन धर्म की राह थी । सनातन धर्म की मर्यादा और रक्षा के लिए वे कोई भी संकट या मुसीबत झेलने को तैयार थे । एक समय पर पीपली में श्री रामदेवजी महाराज के पाटपूजन का प्रसंग था । उस प्रसंग पर रात को बजाणा स्टेट के दरबार साहब जीवणखान बापु को भी मंदिर में धर्म की मर्यादा को देखकर प्रवेश करने नहीं दीया था । जीवणखान बापु को किसीने उ्लटा सुलटी बातें कह कर कानफुसी की थी ।

  9. श्री रामदेव पीर का विसामा

    वि.सं. १९७४ की साल में एक दफा श्री सवाराम साहब ठाकोरजी की पालकी लेकर भक्तजनों के साथ बजाणा गाँव जाते थे । बजाणा से उनको यहां आने का आमंत्रण मीला था । पीपली और बजाणा के बीच पालकी पहुंची तो एक चमत्कारिक घटना हुई । पालकी में से श्रीफल अचानक कूद कर नीचे गीरा । श्री सवाराम साहब इस घटना का मर्म समझ गए और यहां श्री रामदेवजी महाराज की विश्राम करने की इच्छा को समझकर यहां श्रीफल रखकर श्री रामदेवजी महाराज की स्थापना की। तब से यह स्थान ‘‘श्री रामदेव पीर का विसामा’’ नाम से जाना जाता है ।

    इस स्थान से झबुबाई का भी संबंध है । एक बार झबुबाई पैदल चलते चलते पीपली गुरु महाराज के दर्शन के लिए आते थे । जब वे इस स्थान पे आये तो उनको सांस् लेने में तकलीफ हुई और अपना देह छोड दिया । उसी समय तुरन्त ही घोडे स्वार के स्वांग में श्री रामदेव पीर पधारे और उनको अपने दोनों हाथो से उठाकर बैठाया । बाद में उन्होंने अपने पास से मीसरी का पानी पीलाया और उन्हें सजीवन कीया। सजीवन हो कर झबुबाई एक बैलगाडी में बैठकर पीपली मंदिर आये और यहां डेढ दिन और डेढ रात भजन सत्संग करके रात के समय गुरु महाराज के सांनिध्य में अपने देह को अलविदा कीया । देह का त्याग करके सुबह में फिर से भक्तों की उपस्थिति में सजीवन होकर सबको दोनो हाथ जोडकर राम राम कहकर अलविदा कीया । इस कलियुग में तीन तीन दफा देह छोडकर सत का प्रमाण दीया । श्री झबुबाईने वि.सं. १९९८ के अधिक अषाढ वद अमावास्या के दिन प्राण त्याग किया। श्री झबुबाई डालीबाई का अवतार थे । इस ऐतिहासिक विसामे के स्थान पर अब श्री रामदेव पीर का सुंदर देवल बना है ।

  10. श्री जमनामा का अंतिम विदाय संकेत

    पीपली मंदिर में श्री झबुबाई की फूल समाधि के साथ श्री जमनामा की ( यमुनामा ) भी फूल समाधि है । श्री यमुनामाने वि.सं. २००४ ( इसवीसन १९४८ ) के भादो सुद ११ के दिन सतलोक प्रयाण किया । वो भी महान समर्थ देवी का अवतार थी । उन्होंने सात दिन पहेले अपने देहांत की जानकारी दी थी । उस समय पर उनके सुपुत्र श्री हरजीवनदास के धर्मपत्नी श्री जीवतीबा अपने पीयर में थी । ध्रांगध्रा उनका पीयर था । श्री जमनामां को जीवतीबा के हाथों प्रसाद लेने की ईच्छा थी । इसलिए उनको यहां बुलाया गया और अपने निर्धारीत सातवे दिन श्री जीवतीबा के हाथो से प्रसाद पाकर अपने वतन की और चल पडे । इस मृत्युलोक को छोड चले ।

  11. श्री सवाराम साहब का सतलोकवास

    श्री सवाराम साहब अपनी पीछली अवस्था में बुढापे में भजन सत्संग में लीन रहते थे । उनके बेटे श्री हरजीवनदास के सुपुत्र श्री बलदेवदास महाराज तन मन से उनकी सेवा करते थे । श्री सवाराम साहब का स्वभाव उग्र था फिर भी श्री बलदेवदास महाराज प्रेम और धैर्य से उनकी सेवा में लीन रहते थे । वे श्री सवाराम साहब को ज्ञान भक्ति और योग के बारे में आधिनता, जिज्ञासा और नम्रता से सवाल करते थे । श्री सवाराम साहब उनको संतोष मीले ऐसा उत्तर देते थे । श्री सवाराम साहबने श्री बलदेवदास महाराज की बहोत कसोटी की और उस कसोटी में वे पार उतरे । कसोटी में सफल होते ही सद्गुरु श्री सवाराम साहबने उन पर पूर्ण क्रीपा करके वि.सं. २०१७ के मार्गशीर्ष वद ६ के बुधवार की रात सवा बजे उनको संपूर्ण गुरुभेद बक्षिस किया और अपना रुप बनाया ।

    अब श्री सवाराम साहब की आयु सो साल की होने पर इस मर्त्यलोक को छोडने का समय नीकट आ गया । उन्होंने सतलोक जाने के पहेले दो मास पहेले श्री बलदेवदास महाराज को सूचित किया था। थोडे दिन बाद श्री सवाराम साहबने अपने सब साथी हरिजनभाई और सेवको को बुलाकर सूचित किया कि, ‘‘इस मर्त्यलोक में अब मैं थोडे दिन रहनेवाला हूँ । इस नाशवंत देह का विलय अब मुझे दिखाई दे रहा है । तो मैं आप सब संतमंडल को अरज करता हूँ कि श्री रामदेवजी महाराज के मंदिर की व्यवस्था और जिमेवारी मैं श्री बलदेवदास को सौंपता हूँ । मेरे पंचमहाभूत देह विलय बाद सब संतमंडल मीलकर मंदिर के पूजारी श्री बलदेवदास को तिलक करके चादर ओढाना और ठाकर के खोले में बिठाना । मेरी दृष्टि में श्री बलदेवदास में शुभ संस्कार और ईश्वरी अंश दिखाई दे रहे है । वो पूर्व की कमाईवाला योगभ्रष्ट आत्मा है । वो मंदिर की सब व्यवस्था अच्छी तरह से नीभायेगा और श्री रामदेवजी महाराज सभी प्रकार से उनकी सहायता करेंगे ऐसा मेरा आशीर्वाद है ।’’

    ऐसी सूचना के बाद अंतिम दो दिन पहेलेभी फिरसे श्री बलदेवदास महाराज को सूचित किया । श्री बलदेवदास महाराज को चिंता होने लगी। उनकी सोचको श्री सवाराम साहब समज गये और उनकी चिंता दूर करते हुए कहा कि ‘‘भाई, तेरेकु घबराहट की कोई आवश्यकता नहीं है । इस लोक में आ कर जो काम करना था वो तुने कर लिया है । इसलिए कोई चिन्तायुक्त कल्पना करने की तेरेकु जरूरत नहीं है । और मेरे जाने का समय अफर है । मेरे कहने का इतना है कि मेरा शरीर जब छूट जावे तब तुझे क्या करना ऐसी घबराहट होगी । लेकिन इसके बारे में मैंने एक पत्र लिखकर बंद कवर में रखा है और वो कवर पेटी में है । मेरे देहविलय के बाद ये पत्र सबके सामने रख देना । ओर कोई चिन्ता फिकर मत करना । उस पत्र में सब बात लीखी है ।’’

    बादमें श्री सवाराम साहबने सूचित कीये हुए समय वि.सं. २०१७ ( इसवीसन १९६१ ) के वैशाख वद ११ बुधवार के दिन सुबह ११-३० बजे उन्होंने सतलोक की ओर प्रयाण किया । उस समय पर सबको उ्लझन पैदा हुई कि क्या करे ? उनके देह को समाधि दे या अग्निसंस्कार करे ? ऐसे मोके पर श्री बलदेवदास महाराजने श्री सवाराम साहब का पत्र सभा के सामने रखा और दयालजीभाई पेथाभाईने पढकर सबको सुनाया । उसमें लिखा था कि,

    ‘‘हे हरिजन भाईयों ! सबको मेरी अरज है कि इस देह के छूटने से कोई विलाप मत करना । उदास मत होना । इस धरती पर कोई भी कायम नहीं रह सकते है । इसलिए इस लोक का नाम मर्त्यलोक है । बहोत महापुरुष महान समर्थ और सिध्ध होने के बावजूद भी वे सब धरती मां की गोद में समा गए है । तो मेरे लिये भी ये कोई नई बात नहीं है । मेरा शरीर छूटने के बाद सब भक्तलोग मीलकर पालकी बनाके इस शरीर को पदमासन में रखकर बिठाना । धामधूम से रामधून कीर्तन चालु रखना । रामधून कीर्तन गाते गाते स्मशान भूमि में जाकर अग्निसंस्कार करना । इससे सभी तत्त्व अपने आप में मिल जाए । मुझे समाधि मत देना ।

    इसके बाद सभीने मीलकर उनकी सूचना के मुताबिक पालकी बनाकर सारे गाँव में धुमाई और उनके देह का अग्निसंस्कार किया गया। बाद में श्री रामदेवपीर पीठ में उनकी फूल समाध बनाई गई । इस समाधि के लिए उन्होंने पहेले से ही श्री झबुबाई और श्री जमनामा की समाधि के बीच में अपनी जगह रखी थी । आज भी वो तीनो समाधि उसी तरह है ।

  12. मंडप मेला

    श्री सवाराम साहब के देहत्याग के बाद पीछे क्या करना ये एक सवाल पैदा हुआ । सांसारिक रीति से उनका व्यवहार करना या साधु संत की परंपरा के अनुसार व्यवहार करना ? ये उ्लझन पैदा हुई । सद्गुरु श्री बलदेवदास महाराजने साधुशाही की रीति से व्यवहार करने का फेंसला किया। इसके मुताबिक ‘टुकडा’ या ‘मंडपमेला’ का आयोजन किया । ये कठिन कार्य था । बहोत ज्यादा खर्च का मामला था । श्री बलदेवदास महाराज की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, फिर भी दृढ इच्छाशक्ति से ये निर्णय लीया गया । इसके लिए अपने गहने और जमीन जायदाद को बेचने तक सोचा ।

    इस प्रसंग के लिए अधिक ज्येष्ठ सुद १५ का दिन निर्धारीत किया गया । इस मंडप मेले की जिम्मेवारी कर्मीजला के रवि-भाण संप्रदाय के महंत श्री द्वारकादास बापु को सौंपी गई । वे १५ दिन तक पीपली में रहे । आमंत्रण पत्रिकाएँ भेजने पर यहाँ हजारो की तादात में लोग और साधु संत पधारे । सबने भजन-सत्संग और प्रसाद का लाभ लिया ।

    इस समय पे साधुसंत और भक्तसमुदाय की उपस्थिति में श्री बलदेवदास महाराज को विधिवत् तिलक करके चादर अर्पण करके मंदिर का वहीवट और गुरुगादी की जिम्मेवारी सौंपी । लोगोने जयजयकार किया । बाद में साधु संत को भेट पूजा का विवेक करके सबका सन्मान किया गया ।

    इस तरह विपरीत आर्थिक परिस्थितियों के बीच सद्गुरु श्री बलदेवदास महाराज के हस्तक ये प्रसंग की सफलतापूर्वक समाप्ति हुई। श्री रामदेवजी महाराज की क्रीपा से प्रसंग के खर्च की भी भरपाई हो गई ।

    इस तरह सो साल और सो दिन की संपूर्ण आयुवाले श्री सवाराम साहब की आध्यात्मिक अमर वाणी आज भारतवर्ष में सर्वत्र गूंज रही है । भजन के प्यासी लोग और संतपुरुष उनके भजन के चाहक है । इस भजनवाणी का ग्रंथ ‘‘भक्त श्री सवाराम कृत काव्य’’ की बहोत आवृत्ति प्रसिध्ध हो चूकी है । उन्होंने सब सत्ता अपने पास होने के बावजूद भी वो सत्ता को छिपाके रखी थी । उन्होंने लिखा है कि,

अलख खलकनो अनुभवी सकल सत्ता छे हाथमां, दास सवे दीनता ग्रही समजी वालानी वातमां.