प्रागट्य और भजन प्रेम
मातुश्री छे काशीमा, पिता कृष्ण मुज तात । स्वामी फूलगरजी सद्गुरु, सदा सवो नीज दास ॥
सनातन धर्म और आध्यात्मिक क्षेत्र में भारत की पावन भूमि पहेले से ही अग्रेसर रही है । सत्य सनातन धर्म की स्थापना इस धरती पर हुई है । अवतारी पुरुष भी भारत में प्रगट हुए है । इस भूमि पर महान ऋषिमुनि, सिध्ध साधक, योगी, ध्यानी, पीर, फकीर, जति, सति जितने भी पैदा हुए है इतने ओर किसी भी देश में या धरती में पैदा नहीं हुए है । ऐसे महान भारत में मनुष्य जन्म पाना वो सद्भाग्य है । और सच्चे संत पुरुष का मिलन और संग होना वो तो परम भाग्य है ।
ऐसे भारत देश में सौराष्ट्र की भूमि संतो की भूमि मानी जाती है । इस सौराष्ट्र में सुरेन्द्रनगर नामक एक जील्ला है । इस जिल्ले के पीपली गाँव में श्री सवाराम साहब के घर रणुजा के राय बाबा राम देव पीर पधारे है ।
ये पीपलीगाँव श्री सवाराम साहब की प्रागट्य भूमि है । उनका प्रागट्य वि.सं. १९१७ में माघ सुद १५ के दिन हुआ था । वे प्रजापति कूल के थे । उनके पिताजी का नाम श्री करशनदास और माताजी का नाम काशीमा था । वे दोनो संस्कारी संतप्रेमी और भक्तिवान थे । उनका व्यवसाय मिट्टी के बरतन बनाने का था ।
श्री सवाराम साहबने बचपन से ही पिताजी की छत्रछाया गंवा दी थी । मतलब कि श्री करशनदास का देहांत हो गया था । इसलिए बचपन से ही घर का आर्थिक बोज उठाने की जिम्मेवारी आने से उनकी पढाई सिर्फ एक ही कक्षा तक सीमित रह गई ।
बाद में उनका विवाह सुसंस्कारी श्री जमना मां से हुआ । दांपत्य जीवन के फल स्वरूप उनको दो सुपुत्र श्री नानजीभाई और श्री हरजीवनदास हुए ।
श्री सवाराम साहब असाधारण पुरुष थे । संसार के पामर जीवों को चेताने के लिए, उनको मोहनींद से जगाने के लिए उनका आगमन हुआ था ।
इसलिए युवानी की उम्र में ही उनको प्रभुभजन के प्रति लगाव पैदा हुआ । भजन-सत्संग के प्रति प्रेम पैदा हुआ । जहां भी भजन सत्संग हो और उनको आमंत्रण मिले तो वे वहाँ पहुँच जाते थे । बाद में उनको भजन गाने की लगन लगी और ‘हे जाडेजा करी लो कमाणी थोडा जीवणा रे’’ ये तोरल दे का भजन उन्होंने पहले गाना शीखा ।
हमारे संतो और पवित्र ग्रंथो के मतानुसार गुरु बिना ज्ञान नहीं मिलता । नुगरे इन्सान की कोई किंमत नहीं है । श्री सवाराम साहब के गुरु का नाम स्वामी फूलगरजी महाराज था । वे ध्रांगध्रा तालुका के सोखडा नामक गाँव के दशनामी अतीत साधु थे । उन्होंने श्री सवाराम साहब को नाम भजन का महत्व समजाते हुए कहा कि इस नाम भजन से आगे समय आने पर तुम्हें सबकुछ स्वयं आके मील जाएगा ।
इसके बाद श्री सवाराम साहब को भजन और संतो के प्रति इतना लगाव हुआ कि उनको अपने धंधे का भी ख्याल नहीं रहता था और माताजी उनको डांटते भी थे । माताजी के डांटने पर वे उनको विवेकपूर्ण ज्ञानयुक्त उत्तर देते थे ।